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Full text of "श्री रामतीर्थ के लेख व उपदेश भाग 27"

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वर्ष पाँचवां ] श्रीरामतीथ गन्धावज्ञी [ खंड तीसरा, 


श्री 


स्वामी रामतीथे 


उनके सदुपदेश-भाग २७ । 





प्रका शक 
श्री रामतीर्थ पब्लिकेशन लीग 
लखनऊ । 
रा र्ग हे अपएरद पट शेड 
का टि०० | ४२3४2 35 335 ॥ अ,प- १२८१ 
बाद्‌ 
हमारे फुटकर 


हो कि| जिल्द्‌ ॥2) सज़िल्द ॥>] 


निवेदन । 


इस बार श्री आर,एस,नारायण स्वामीजी, जो अन्धाचली 
के अनुवाद के अध्यक्ष है दो मास तक बादर प्ेतों में 
ख्रमण करते रहें, ओर जिस प्रेस में अन्धावली छपती हे बह्द 
अपने पुराने स्थान को छोड़ कर नवीन स्थान में आने के 
कारण फरई दिन तक घन्द रहा, इस किये दो मास के 
स्थान पर चार मास में यह र७ वां भाग प्रकाशित हो 
सका | पर अब अच्छा प्रबन्ध क्रिया जा रहा है जिस से 
आशा पढ़ती है कि शेप तीन भाग तीन मास के भीतर २ 
प्काशित हो जायेंगे । 


यद्द २७ वां भाग एक प्रकार से स्वामी राम के लेखों वा 
व्याख्यानों का अन्तिम माग है, फ्योंकि अब क्षाई व्याण्यात् 
या लेख स्घामी जी का हमोरे पास छपना बाकी नईही। रहा। 
केवल अंग्रेज़ी पुस्तक दाद आफ राम ( का ० रिश्वत 
रामहदय ) जिस में स्वामी जी फे उपदेशों से चुने हुए 
तस्यरूप वाक्य नव अध्यायां में विभक्क प्रकाशित हैं, उन 
का हिन्दी अनुवाद छुपना बाकी रद्दा है । इस के छपने के * 
बाद फोई स्वामी जी क्वला ऐसा लेख वा व्याख्यान अब 
हमारे पास नहीं है कि जो ग्रन्थावली में नहीं आ छुकका। 
यदि किसी रामप्यारे के पास कोई ऐसा खेख या व्याण्यान 
हो कि जो अन्धापली में न आया हो तो डसके, भेजने की 


विषय सूची 


विषय पृष्ठ 
पाप की समस्या 4 
भारतवर्ष के संबंध में तथ्य और आंकड़े १४ 
पत्र मंज्जूषा २० 
कविता ध्छ 


था प्पाड0 8 7, 6, 85773 &फए पफ्ताड 4अद्ा.0-0ापपप का: 
एफछ58, 7,ए00एफ्0० एफ: 


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स्‍्वासी राखतीय ।॥ 


0/च्ड० ९० 


पाप की समस्या । 


4 मु ई ० हर 
२८ दिसन्वर १९०२ को दिया हुआ व्याख्यान ) 

वेदान्त की शिक्षाओं पर कुछ आपत्तिरां राम की -हृष्टि 
में ,लाई गई हैं। उस दिन क्रिसी मनुष्य ने कहा कि यदि 
.दिन्दुओं का तत्वज्ञान यही हो तो भारत के राजनीतिक एतन 
६.) कारण समभना सहज है । दूसरे मनुष्य ने राम रे पूछा,यदि्‌ 
िन्दुओ की शिक्षाये,चेदान्त, अथोत्‌ यह तत्वश्ञान, यद्द घमे 
दुनिया का सर्वोत्कष्ट धम और तत्वशान होते, तो भारतवदर्ण 
इतना श्रन्धकार भ्रस्त और ईसाई देश इतने समृद्ध क्यों होते ! 
राम इस समय इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देगा, क्‍योंकि 
यदि ये प्रश्न उठा लिये जांयंग ते निश्चित विषय को त्याग 





पाप की समसयों- 


अजन्लुसन्धान होना चाहिये, अन्यथा कंठिनता हल हें: 
होसकती । यही खुख मलुष्यों को गुलाम बनाता है। दोमँंगे 
रण (770[9870 ए़&7 ) इसका दछान्त है। यह हे जो एक 
लड़की को वीर बना देता है और दूसरी को नहीं। यह कद्दना 
गलत है कि यह सुख स्वयं नारी से आता है। हमे इंसमे 
की भूल की समक लेना चादिये। उस में या उसके शेंरीर 
में कोई सुख नहीं है । 


यदि सर्च खुख प्रियचस्तु (वा प्रेम पात्न ) में न केन्द्रित 
दी, तो क्या स्त्री ओर पुरुष सदा एक दूसरे के लिये सुख 
का स्त्रोत बने रहते ? हम जानते है. कि यह खत्य नहीं है | 
अब आप- अपना सुख भोग छुकते हो, तो डसके घाद आप 
किस दशा में होते हो? और छुख की चतना फिर नहीं 
रहती । जब तुम नपुंसक होते हो, तब क्‍या वह (नारी 
सुख का,स्त्रोत होती है ? जब तुम्हारी अद्धांगी रोगीहोती 
है,जब वह व्यभिचारिणी होती है, जब तुम बीमार होते हो, 
तब उसमे कोई सुख नद्दी रहता। यहां तुम दो पृथक सत्ताएँ 
पाते हो--छेत । जब ये अनुपस्थिति होती हैँ तो केवल 
शरीर ही की पूरे एकता नहीं होती किन्तु मन और 
आत्मा की भी होती है । फिर एक देसी अचस्था आती 
हे जिसका वर्णन नहीं हो सकता । तब देह देह नहीं है, 
संसार संसार नहीं है, पकता, स्वगे, स्वाधीनता, असयता-- 
क्योंकि देत नहीं हे--अभिन्‍नता, अद्धेतता विराज्ञती दे। 
दुनिया और देह के विनाश का बिलकुल नाश हो गया ! 
द्वेत-भ्रम का अब अस्तित्व नहीं रहा। न में देह है और न 
बह (नारी) देह हे; हम दोनों शरीर,मन, दुनियां से ऊपर हैं । 
' बेकुंगठ फिर प्राप्त होगया, लद्य पर पहुँच होगई, अब केई 


( + २ ) 
शीघ्र कृपा करें जिस से रोम के समग्र अ्न्‍्था में बह भी 
शामिल॑'हो-सख़के । 


अन्त मे इश्वरः .का' धन्यवाद हे कि लीग अपनी धीमी 
वा अविश्वान्त गति से इस असिविशाल कार्य को करने में 
सफल हुई है, झोर जिन महानुभावाों ने अपनी उदारता और 
राम भेम से भेरित होकर इस मद्दान काये में तन, मन या-पछछ 
घन से सद्दायता दी है उन के लिये तो मेरा रोम २ घन्य- * श्‌ 
बाद दे रहा दहे। आशा हे वे प्यारे इसी प्रकार अपनी 
सद्दायता का लाभ लीग को पईुँचाते रदेगे जिस सर लीग (.५ 
झपने उद्देश्यों में भली भान्ति सफल होती सटे । ४» | 


, मंत्री 


&४ 


पाप की समस्या. । शक 


चारिक क्लेश होते हैं। तभी स्वार्थों की मुट्मेड़ होती है, और 
विवाह चाली रुकावर्ट तंव उत्पन्न होती हैं। वेदान्त को 
समझो ओर सुक्क हो । और नाम मात्र भ्न्थिश्रों के अतिरिक्त 

ओर कोई गअन्थि नहीं हे । हरेक स्वाधीन होने के लिये हे। 
अपने बच्चों को पूर्शतया स्वाधीन होने दो | उस से मनुष्य: 
कभी नहीं बिगड़ता । संपूर्ण संसार एक स्वगे है, ओर 
परमेश्वर को कभी धोखा नहीं दिया जा सकेगा । 


छ5 | छ5 है! 8» ! [| 


२ ००4 ५ दर 
भारतवर्ष के सम्बन्ध में तथ्य ओर आकड़े.. २६ 


पाऊंड दो गया हे | भारत में यूरोपीय क्षफसरो को तनखाह, 
जिनका यथार्थ में सब ऊंची नोकऋरियों पर पूर्णाधिकार है, 
उक करोड़ पाउड पड़ती हैं । 

भारत की निहलोह ( खजे बाद देकर नकद्‌-76: 
780076 ) की आधी रकम, जो अब ४ करोड़ ४० लाख 
याउड है, हर साल भारत के बाहर बह ज्ातो हे । 

[ ऊपर के तथ्य, ईग्लड में प्रकाशित एक पुस्तक, सर 
रोमेश दत्त सी. आई. ६० कृत 'चुटिश भारत का आथक 
- इतिहास (7४8 +#;0070770 प्राह्0ए ए फिल्रपशा ः 
]४0/9) के आधार पर दिये गये है। ] 

१६०१ में भारत में विधवाओं की संख्या ४४३६३६० थी ।* 
बंगाला प्रान्त में २६४५६२२ बालिका विधवाएं हैं । 


| ७४ !! ४४ !!! 


९ 


किक न-र 
था 


च 


ढ़ ० ५० + थक बडे जो 





& वाशा 


छह २४ 


0). #. 


8. 
पहला 8 9 7 एश्फाण्धशा१- 


5 


]902, 


॥५क्‍ 
हि 


५ 


- पत्न मज्जूपा, २६ 


व्यवद्दारतः आसन्तरिक साम्यता पर, जो हरेक वस्तु पर 
शासन करती हे,विश्वास न करना | 


लोगों के शब्दों, या बाह्य आचरण से नतीजों पर 
फुदक जाना और रुद्दानी कानून में विश्वास पूर्वक पूणतया 
संतुष्ट न रहना । ह॒ 
८. लोगों से चार्तालाप में (निज्ञ स्वरूप से ) वहुत दूर 
भटक जाना | . 
यबाते हैं जो लोगों के मन में असंतोप डत्पन्च करती 
हैँ। इस लिये कलश के इन आठ स्लोतों ( कारणों ).ल आप 
दुर रहियेगा | ३४ ! 


तुम्हारा अपना प्रिय स्वरूप 
रामस्वासी के रूप में 
॥श्रीडक॥. 
मुजफ्फर नगर, 
श्ण अक्टूबर १६०४५। 
प्रियतम, मदान्ुभावच, हि 
हाथों में मली हुई राख खाल को साफ (स्वच्छ) कर 
देती है । 
इस प्रकार, शाशीरेक रोग तीन बार धन्य हैं, जब थे 
अपने साथ देहाध्यास रूपी मल्न को जड़ा देते हैं । 
अरे, रोग ओर पीड़ा का स्वागत करो ! 


जब तक एक निर्जीय शव घर में पड़ा है, तब तक सब 
प्रकार की महामारियों का बड़ा खठका हैं। जब मुद्दा हट 
जाता है, तब्र स्वस्थता का परम राज्य विराजता दे । ठीक 
: इसी तरह जब तक देद्ाध्यास का पोषण किया जाता है, तब 


डा 


र्‌ स्वामी रामतीर्थ- 


देना पड़ेगा। किन्तु ये प्रश्न कुछ बाद के व्याख्यानों से 
ढठाये जांयंग और इन के उत्तर इस तरह पर दिये जांयसे 
कि सथघ लोग चकित हो जांयगे | किन खोगो को ( राम के ) 
कुछ उपदेश खुनने मिले है, राम केवल उनसे अधीर न हे।ते 
री, तुरन्त नतीजों पर न फुदकने की प्राथना करता है। 
राम चाहता है कि वे तनिक धीरज रफ्खे और चक्का को! 
आयद्रापान्त खुन ल । ५ | 

मुसलमानों की इंजील, अलकोरान में एक वाक्य इस 
प्रकार छे, “असदाचार ओर दुगुण के हवाले (यांदे ) तुम 
अपने की कर दो, मद्यपान ओर विषयभोग भे ( यदि ) 
तुम अपने जीवनों को लगा दो, तो तुम अपनी सत्य/नाशी/ 
आप कर रहे हो, तब तुम अपना सत्यानाश आप भ्रतिपा ह 
करोगे ।” एक मुसलहूमाव सज्जन शगाव पीते ओर इन्द्रियो 
खुखों के पीछे दोड़ता हुआ ओर काम-वासनाओं 
भागता देखा गया था। एक मुसलमाव धरम्मोचाय उस 
पास पहुंचा ओर उसे फटकारते हुण कहा कि "ऐेला रे 
कर क्योकि तू अपने ( मुसलमान के ) पेगस्वर के नियत 
किये हुए नियमों को मंग कर रहा है।” तव इस शराबी 
ने अलकोरान के बचन का पहला भाग तुरन्त पढ़ा ऑर 
कहा “यह देखों। अत्तकोरान कहता हं, तुम शराब पियो 
ओर आनन्द करों ओर अपने आप कामाचार के गह 
कर दो। अलकारान का, हमारे धर्मेग्रथों का, हमारी ईजी 
का, यह यथाथ चचन है। अलकोरान, धंमैश्नेंथ मद्रिपान 
ओर कामयरायणुता की आज्ञा देते हैं। कक्‍्योंचि न दे?” 


तब तो धर्माचाये ने कहा, “भाई !रे भाई. तुम क्‍या 
करने जा रहे हो ? बाद के भाग को भी तो पढ़ो, ' तुम आप 


पाप को समसस्‍्य:[. दर 


अपना सत्यानाश कगोगे ” (यह है बचन का दूसरा साग ) | 
दूसरा भाग भी तो पढ़ा । ” शराबी न जवाब दिया, “पृथ्वी- 
तल पर एक भी महुप्य ऐसा नहीं है ज्ञो सारे अलकोरान 
पर अमल कर सके | छुझ इस हिस्सल पर अमल करने दो। 
यह आशा या कल्पना नहीं की जा सऋती कि कोई मनुष्य 
इंजील की सब नलीदतों एर अमल कर सकता है। कुछ लोग 
“थोड़े अश पर झपल कर सकते हैं ओर झुछ बड़े अंश पर; 
ओरबस। उस समग्र अलकुरान पर कोई नहीं ऋमल करता। 
फिर आप सुक से समग्र पर असल करने की आशा क्यों 
रखते हैं ? मुझे वचन के प्रथम भाग का उपयोग 
करने दो” 
अतः राम की केवल यही प्रार्थना है कि उस मुसलमान 
शरादी की तऊ-शेल्ली वा तत््यज्ञान का उपयोग नहां किया 
ज्ञाना चाहिये । पूप वचन पढ़ना उचित है, तब परिणाम 
मनिकाला जाय, उससे पहले नहीं। 


एक समय रास के पास एक सेन की घड़ी थी। चेर 
में लगे हुए छोटे अलकारो भें एक खिलोना-घड़ी थी, जोः 
चास्तव में कुतुबछुमा या परकार था| बह ( खिलोना-घड़ी ) 
चलती नहीं थी, किन्तु खुश्यों को एक विशेष पघरकार से ठीक 
करने पर वह एक बज्ञा सकती थी। सदा एक वज्ा रहता 
था, द्वेत के लिये काई स्थान नहीं था । चद्दी एक तुम हो। 
समय, स्थान ओर कारणत्व अर्थात्‌ दर्श, काल, वस्तु से 
ऊपर खड़े हो । ये सब ठुम से शाखित द्वोते हैं, तुम उनसे 
नहीं । दे तुम्हारी कल्पना शक्ति के चाकर हे--दो ओर तीन 
मिथ्या ं--चह एक तो काल के वंधन से सु दे । 


प्रण-- क्या विवादित मनुष्य आत्माज्ञभव की प्राव्दि 


६3 


श्र स्वामी रामतीर्थ- 


का होसला कर सकता है? 

प्रक खूचना के उत्तर में कि “इस भश्न रा विचार न 
किया जाय ओर इसके बदले में राम के यांघे हुए विषय का 
अनुसरण किया जाय ” राम कहता हे कि दरेक विषय राम 
का हे । इसका यदि पूर्ण विवेचन किया जायगा तो आपका 
बड़ा कल्याण दोगा--किन्तु यद विस्मयज्ञनक है, तुम्दें यद्_ 
पूरा सुनना दोगा। इस देश के विचारों के शायद यद्द 
विश्वित्र जान यड़े । राम इसकी परवाह नहीं करता, वह 
केवल तुम्दारा आदर करता है। 

हस द्वश्न के उत्तर मे वेदान्त कहता हें, “अचश्य ही, 
झोपधि बीमार को दी जाती . है, ओर उसको नहीं कि जो 
ऋच्छा भला हे? । 

जो दुनिया ओर उसके खतरों में सब से- अधिक फंसे 
है, उन्हीं को रसकी सब से अधिक ज़रुरत है। एक अविवा- 


'द्वित महुष्य के लिये आत्मानुमव उतना सहज नहीं दें 


जितना कि विवाहित ओर पारिवारिक जीवन को यथाथे रीति 
पर निवोहकारी मनुष्य के लिये । किन्तु असावधान ढेग 
से वह अनुभव नहीं कर सकता ओर उल्टा नीचे घसीटा 
जाता दे। पुरुष ओर स्त्री के सच्चे संबध के ज्ञान की 
बैखबरी बड़ी मुसीबत का कारण होती है। इतने मदत्वपूर्र 
ओर हदय के नगीची विषय का निवारण क्‍यों न फिया 
जाय ९ हस प्रश्न का एक पहलू ( विवाह की तेयारों ) इस 
समय नहीं उठाया ज्ञायगा ? यह एक बड़ा विषय है ओर 
बाद के किसी व्याख्यान से इस पर विचार किया जायगा। 


शम के विषाद के बाद उसने ओर उसकी ख्री ने दे! साल 
सक बह्मचर्य पालन किया ।यह तथ्य है, केवल ज़बानी 


पाप की समसस्‍्या- प्झ 
खलमाखनये नहीं। 


विवाह हानिकारक नहीं है, केवल वह कमज़ोरी 
( हानिकर ) है जो उसमे क़ाबू जमा लेने पाती हे; चह 
घस्तुतः हानिकर है; भय, पदार्थों ओर रूप में लगन, “में देह 
हूं, मेरा साथी देह हे, ” इस कल्पना की पुष्टि करना, अधि 
कार जमाने की लालसा ओर उस का भाव ग्रहण करना 
पतनकारा तत्व हैं । यदि वेचाहिक संबंधों के पालन का 
यही ढेग हो, तो मनुष्य कभी आत्मातुभव नहीं कर सकता। 


5 कक 


. पिनेलोपी (?शा० ००७) जब बीनती और उचेड़ डालती 
' है, तो उसका काम कभी केस समाप्त' हो सकता है? घट 
मलुष्य भला कैसे उन्‍्नीत कर सकता है जो सदा उस सद 
का निराकरण कर देता है कि जो उसने प्राप्त किया था! 
' बैदान्त निभयता से कहता है कि तुमर्म शक्ति का संचार 
होना चाहिये, तुम्हें डड्चतर प्रेम से परिपूर्ण हेाना चाहिये, 
जिसे भूठ ही में प्रेम कहा जाता है, उसकी तुच्छता और 
नीचता से ऊपर उठना चाहिये--देद्दाध्याल से ऊपर 
उठो। यह है बीनने की क्रिया। ज़ब तुम पति या पत्मी में 
केवल देह देखते हो, तब सब किया धरा चोपद होजाता 
है। केस तुम उन्‍नति कर सकते हो? क्या इससे यह 
_ निकलता है कि लोगों को विवाह नहीं करना चाहिये! 
नहीं, किन्तु विवाह का उपयोग मिन्‍न होना चाहिये | वेदास्द 
के उपदेश को समझो । विवाह को अपने उक्तष का एक 
साधन बनाओ, तब वह वड़ा सहायक होजाता है। ठोकर 
लगाने वाला ढेला ज़ीने का वा पार टपने का पत्थर बन खाता 
है। जब विवाद काम-विकार की शुल्ामी बनजाता है, तंज 
मुम्दारी दर बार की तुष्टि में गुलामी बढ़ती है, और तुम 


कं स्वामी रामतीथे. 
अधिकाधिक नीचे ही ड्बते जाते हो । 
अमे-प्रवतिकोी (70.॥०१४) के वचन नारी के विरुद्ध है। वें 
कहते हैं कि नारी “नरक का द्वार है। ” राम सहमत नहीं 
कै।सड़क पर चलता हुआ एक मनुष्य (शराव की एक बोतरू 
उसकी जेब से दाहर निकली हुई है ) एक पुजारी से मिलता 
है. जल की राह पूछता है, उसका परिद्शन करना चाहता 
है, जैसा कि राम ने पिछले सप्ताह किया था। पुजारी के 
हाथ में एक छड़ी हे और उससे उसने बोतल छुई | कंदा 
कि “८ भाई, यह सबसे नज़दीक' का रास्ता हैं, यह तुम्द 
अवश्य वहां पहुँचा देगा । ” इस प्रकार नारी के सम्बन्ध में 
कहा जाता है। डुनिया एक जेल है--आधुनिक विचाह 
अचश्य तुम्हे वहां पहुंचाता है । यदि नर ओर नारे एक 
दुसरे के पतल का कारण हैं, तो उसी परमेश्वर ने जिसने' 
इंसलि लिखी हे मनुष्यों के हृदय में नारी को ढूँढ़ने की फेरसी 
इंज़ील क्यों लिखी ? यह ते वचर्नाचिरोध है । इस भ्रन्थि भे 
पुक गृढ़ अर्थ हैं। वह अज्ञान हे जो इसे नरक का उपाय 
बनाता है । केचल उसी को दोप देता चाहिये, न कि विवाह 
के सम्बन्ध की | मश्न यह है कि उसे ( अज्षान को ) दूर . 
केस कया जाय | यह एक शत्व वदंन्दुह  यादे शनन्‍्य दशम- 
लच विन्दु (९९४३०) 00४) की दाहियी ओर शरक्खा जाता 
है, तो उसका मूल्य घट जाता हैं| शल्य खद कोई मूल्य नहीं 
रखता, अपने सम्बन्ध ओर स्थिति से ही वह सूदयवान 
बनता है इसी तरह इस मामले मे आप की स्थिति सम्बन्ध 
का मूल्य स्थिर करती है, अपने आप खे नहीं, सिर्फ आप 
के अपने ढेग से | 
मजुष्यको अपनी स्त्री में खुख क्‍यों मिलता हैं ? इसका 


ट्् स्वामी रामतीथे- 


इशा या अवस्था नहीं ! वेदान्त कहता दे के तुम- तब 
अपनी सच्ची झात्मा के लिये शक्ति आर परमानन्द होते डो, 

छो तुम सचमुच दो उसने पूरा मंडल ( चक्र ) बना लिया 

ह--धन और ऋण की एकता दोगई दे, पूरी घूमी हुई 

घिजली-बत्ती की सी रोशनी हो रही है । बिजली का घेरा 
'बूरा हो गया है, धुंबे एकत्र होगये ढें--और मामूली या 

असली हालत फिर होगई है ! आनन्द, निर्माकता, उत्पादक 
शक्ति, साक्षाव ईश्वर-अर्थात्‌ असली यथार्थ आत्मा, 

झौर तय हम कद सकते हैं, “यद महलष्य ईश्वर का पुत्र 

है। ” जब पति और पत्नी मूलतत्व में लीन द्वोगये हैं, , 
सच उसमें गल जाते हैं, तब सारी दुनिया विलीन हो जाती 

है, मानो श्रात्मा स खा ली जाती है; सब जातियां, वर्ण, 

ओर सम्प्रदाय चावल के तुल्य होते हैं, जिसमे सत्यु मसाला 

डालने के समान ( चटनी) होती है, आत्मा उसे खा खेता 

है, क्योंकि आत्मा उत्पादक शक्ति है। ५ 


दुसरी ओर हम देखते है कि, वेदान्त के अनुसार अज्ञानो 
चुरुष, न जानता हुआ, बाहरी रूप, मिथ्या पदार्थों के प्रेम में 
कस जाता है, आत्मा का अनादर करवाता है ओर केवल 
बाहरी चिन्हों का विचार किया ज्ञाता है । 


५. पक मलुष्य जेगल मं पक किताब ज़मीन पर पड़ी देखता 
है । बिजली चमकती है। चह मूर्खता से समभता हे कि 
बिजली का कारण पुस्तक हुई है, अन्यथा किसी तरद्द नहीं 
भानता, ये दानो चीज़ें उसने एक साथ देखीं और समभता 
है कि एक दूसरी की कारण है । सो मनुष्य को एकता में 
झानन्द की प्राष्ति होती है, जिसका कारण वयास्तव में-नर 
था नारे नहीं हे, किन्तु परमेश्वर की वास्तविकता है, पर 


पाए की समस्या. ६. 


अपन भय मे घह डस आनन्द को एक मानवीय पदाथे का 
संसर्गी मादता हैे। 


आप इस तथ्य का क्या उपयोग कर सकते हैं? आप 
को उसी कण अनुभव करना चाहिये कि जब मन पदाये 
और विषयभोग से हटा लिया जाता है और केवल आनन्द 
का विचार करता है जो एक शक्तिरूुप, तेज स्वरूप, सच्चा 
आत्मा है, तब अधम मन में उतरने की कोई ज़रूरत नहीं 
है, जा सायब हो जाता है,--यह देवी तत्व वही है जो सूर्य, 
चन्द्रमा, शाक्क, अनन्त, देश काल चस्तु से परे, एक सागर 
है, जिसमें सब पदार्थ लहरों, तरंगों, झूवरों के तुल्य हैं, 
असली, आधारभूत, मूल तत्व के रूप ह। तुम्हारे शरीर 
इन तरंगों ओर लहरों के समांत हे, भेदभाव का एक मा 
कारण जल है। एक वच्चा नदी की ओर देखता हुआ कदता 
है, “भाई ! देखो, यह पक लहर आ रही है? । यहां जल पहले 
ही से है, किन्तु प्रधानता व्यापार को दी गई हे। “में तुम्हें 
धुक लहर दिख।ऊँगा, न कि एक नदी । ठीक बही बात यहां 
भी है, एक निवेयव पस्मेश्चर है ! सूर्य, चन्द्र, शरीर, ओर 
तरंग “मे तू” रूपी मानस सागर भे उमड़ती हे । इस त्तरदह 
मनुष्य अनेकता लाता है, नाम रूपी दृश्य में पधारता है, 
शरीर का संघप होता है, तरंग एक दूसरे से टऋरती हेँ। 
सुख केवल पदाथे के संघर्ष के द्वारा नहीं होता, वह तो 
आत्मा की उपस्थिति है, जो लहरों के टूटने पर स्पष्ट 
होती है | चेदान्ती बच्चे की सिखाना चाहता हे कि सोना 
कया है, उस पक झओगूठी दिखा कर कहता है, “यह खुबरे 
है।” बच्चा कद्दता हे, “कया गोलाई सोना है?” नहीं। 
/क्ष्या रंग सोना हे?” नहीं। “चिकनाई !” नहीं, नहीं! 


9७ स्वामी रामतीर्थ- 


६] 


पक भावना दी कैसे जा सकती हे ? सेलने की दूसरी बस्तु 
भी दिखाई जाती है । अन्ततः वह भावना वा. कल्पना 
निकाल ली गई । वह इसका अनुभव करता है। उनके 
गुणों को यथाथे रूप से पहचानो ओर उन्हे जीवन में चता । 
बीरबल ते बादशाह से पूछा (के अन्धो की संख्या अधिक 
है या दष्ठि वालों की । बहस हुईं और निश्चय हुआ कि इसे 
साबित किया जाय | वादशाह समभझता था कि अंधे कम हैं। 
इस लिये प्रमाण के लिये वह एक डुकड़ा कपड़ का खाया, 
ओर झपने सिर में लपेट कर उसने पूछा “” यह क्या हें?” 
उत्तर मिला, “ पणड़ी | तब उसने कपड़े को अपन कनन्‍्धां 
पर रखा ओर लोगों से पूछा, “यद्द क्‍या है ?” उत्तर मिला । 
' शाल ?, तीसरी बार उसने कपड़े को घोती की तरह 
पहरा, ओर उन्हीं ने इसे उसी नाम स पुकारा। “ सब अंधे, 
अथे ! इन ( उक्त नामों ) में से यह कुछ भी नहीं है, केचल 
कपड़ा है, नामी ओर रूपों से कपड़ा छिपा दिया गया हे ।'' 
अजन्ुभव करो कि शआात्मा क्‍या है, सोने को देखने के 
लिये यह ज़रूरत नहीं हैं कि आप डसे तोड़े । जब आप 
नर, नारी, सवरों, खबरों कपड़े आझोर सेन का विचार 
करत है, तब आप पीछे को (आधारभूत) वास्तविकता 
का नहों विचार करते । 


मत कहो कि विवाह धरम के विझुझ है। देखो कि सुखकी 
चास्तादेक दशा क्या है, वास्तविक स्वरूप क्या है। आत्मा- 
जुभव के आंभल्ापी मनुष्य की हेखियत से, सच्चे आतन्न 
वास्तविकता, मल तत्व! पर विचार करे । जब मलुष्य, 
पगड़ी, शाल रूपी पहचान की चेतना तुममें न रद जाय, तब 


भ्यान परायण हो कर बन्धन के कारण को निम्मेल कर दो, 


पाप की समस्या. श््ः 


धास्तदिफता में डूब आओ । 
ई३०--वह में हँ-इसे सिद्ध करा, “ क्या वह मेरी असली 
' प्रकृत्ति हे ! क्‍या में वह हूँ ! ” यदि में हूँ, तो दुनिया केवल 
एक तरंग दे, में क्‍यों उसके पीछे लल्नचाऊं ? क्यो ? क्योंकि 
देदीप्यमान ख्य में कोई विजली की रोशनी चमकती नहीं है। 
चह केवल अधरे ही में चमकती ओर प्रकाश देनी है | घीरे 
धीरे उज्ज्वल सूर्य-प्रकाश में आओ, इन्द्रियों का खुल दीपक 
की तरह कोई प्रभा नहीं फलाता । गाली देना और निन्‍्दा करना 
' अस्वाज्षाधिक दे | तुम इसे तभी कुचल सकते हो जब इस 
से ऊपर उठो | भाई ! उपाय का उपयोग करो और डठो | 
दुनिया खुद एक अजमभा है । दसरे अचस्मों की कोई 
ज़रूरत नहीं है । सब पापा के कारण से डसे जो कचल 
आत्मा को जानने से दूर होता है | विशुद्धता का अदुसव 
करो और घिशुद्ध हो जाओ ५ दूसरे किसी थम की शिक्षा. 
देना अस्वाभाविक है! 
+[)0 6006 07" 00 ग्र्ा 60776, 
एज 78 स॥ 776- 
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४ 778 ए०ए 6, ॥ ॥6 ए00ए 7079€. 
७० 706 78 486€, 
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8-78 ता कराए गहाए8 बावे ९ 74 कफ. 
# आओ वा न आओ, 
'तुम मुझ में हो । 
दुर रहो, था, सिकट रहो, जहां क््दी तुम हो, 


डर स्वामी रामती्थ, 


मुझ में तुम हो, मुझ में तुम्हारी गति. । 
नहीं, में तू हूं, 
मुझ में घुल जाओ, और आनन्दमय सागर, हो जाझे/ 
दाता हूँ और मांगने चाला नहों हें । 
. भरी प्रकृति को भोगो और खुखी हो | 


भारत में तर्क संगत, पैज्ञानिक, और स्वाभाविक विधि 
यह प्रचलित है कि सती सहायता ऋरती हे, पति की बाधक 
नहीं होती । ३ 


आत्मानुभव कर चुकने के बाद दो साख ओर राम 
शहस्थ रहा | अपनी रसत्रीस उसने चेदान्त की चचो- की, 
ओर धह फूल, बतियां लाती, और निञ्ञ-आत्मा में क्लीन हो 
जाती थी। वह अब दंडवत प्रणाम करके उपासना-करती हैं, 
बकिर राम की ओर तब तक देखती है ज़ब तक उस ( शम ) 
की देह उसके लिये एक ( परमात्मा का ) चिन्द्र नहीं है। 
ज्ञाती, » डच्चारती है, राम में आत्मा के दशन करती 
है और अपने आप में पस्मेश्वर को देखती है, इन विचारों 
को याहिर भेजती है, प्रत्येक आपस में परमेश्वर को देखता 
है, परस्पर एक दूसरे की सहायता करते है, ओर आत्मा- 
जुभव प्राप्त करते है। राम ने उस उठाने में सहायता दी। 
यह कुछ समय तक होता रहा, फिर उन्हेंने महीनों साथ 
बिताये, अधम बिचारों का कोई] खयाल उन्‍हें नहों आया: 
कास-पिकार जीत लिया गया था । परस्पर एक दुसरे को 
यथार्थ समझते थे, दोनो मुक्त थे । पति और पत्नी का विचार 
जाता रहा था, कार बधन नहीं था ( वचद्द उस अपना. पति 
नहीं समझती है और न चह उसे अपनी ख्री समझता दे । 


खिचारों की संकरीणेता, और अधिकारों के कारण पारि- 


भारतवर्ष के सम्बन्ध में तथ्य ओर आंकड़े ! 


भारतवर्ष का बाह्य रक़्त्ा लगभग वीस लाख चर्म मील 
है, अथवा अलास्का, ओरीगन और केलीफोर्निया छोड़ कर 
सारे अमरिका के यरावर हैं। 

आदादी लगभग ३० करोड़ हैं, अथवा मानव जाति के 
पञ्चमांश के लगभग। रूस्पूर्ण साथाज्य में, पहाड़, ऊसर 
और जंगल के सहित प्रात वरग मील १६७ की आपांदी है, 
इसके सिपरीत अमेरिक्रा मे २१-४ है। बंगाल प्रान्त में प्रति 
वर्ग मील में श्य्ण की आबादी है। भारत के कुछ सागों में 
इतनी वड़ी आवबादो है कि दुनिया का कोई भी साग उतनी 
| आाचादी » उछह. रखता ) 


भारतवप से हर प्रकार की जलवायु है । डसकी भूमि 
के एक भाग में दुनिया भर से अधिक्रतम जलेतुष्ठि होती है। 
दूसर दविसस्‍ल में, जो कइ लाख वर्षमील का है, एक वूँद भी 
पानी शायद्‌ ही कभी बदरलता है। 


भारत मे ११८ विभिन्‍न भाषाएँ बोली जाती हैं, और इन 
में से ४६ सापाओं के बोलन वालों की संख्या एक लाख से 
अधिक हरे । 

चहां चीस साख से अधिक ईसाई हैँ, जिस में से १० 
लाख से अधिक रोमन केथोलिक हैँ, ४५३६१२ चचे आफ 
इ्लेड सम्प्रराय के हैं, रेश्शश्८६ कट्र ओआक चर्च क हैं, 
२२०-६३ बंपटिस्ट हे, १४५४४५४ लुथर-अनुयायी हैं, ३८२६ 
प्रेलवाइ टीरियन हैं, ओर १५७८४७ फुटकर ईसाई हैं ।इन 


प्र 


इसाइयाों (२० लाख से कुछ ऊपर ) में विदेशियाँ, वृटिश 


भारतवर्ष के सम्बन्ध में तथ्य और आंकड़े... १४ 


सेना, विदेशी धर्म प्रचारक ( 7ग580707५6४ ) इत्यादि, को 
आवादी शामिल है। इस तरह देशी ईसाइयों की संख्या 
अधिक नहीं हैं, ओर जो भारतवाली ईस'ई बनाये गये हैं, थे 
अत्यन्त नीच जातियों के हैं। उच्च जातियों का बिलकुल 
सपश नहीं हुआ है| अंग्रेज सरकार भारतीय खज़ान से हर 
साल पेंतालीस लाख रुपये इंसाई घर पर खच करती है । 

पिछली मर्दुमश॒मारी के अचु सार ४४७६२५४६६४ एकड़ भूमि 
पर खेती होती है, जो ओलत में आबादी के प्रति मनुष्य के 
हिस्सेम लगभग २ एकड़ है | दो करोड़ बीस लाख से अधिक 
पकड़ भूमि साल से दो फसलें पेदा करती है । १७ कड़ोर ४७ 
लाख ३५ हज़ार मनुष्य निरानिर खेती करते हैँ । ३५४६८००० 
महुष्य न्‍्यूनाधिक खेती के काम में नोकर हैं। २६ लाख 
४६ हज़ार मन्ुप्य मवेशी ५ पशु ) पालने भें ओर १ करोड़ 
४५ लाख ७६ हज़ार खाद्य और पेय के उत्पादव में लगे हे। 
१ करोड़ १२ लाख २० हज़ार मनुष्य घरेलू चाक्करी करते 
हैं।१ कड़ार २६ लाख ११ हज़ार कपड़ा बनाने, रे३रे६१००० 
शौशा, बर्तन, ओर पत्थर की चीज़ बनाने में लगे है, ३२ 
लाख ८५ हज़ार चमड़े का कारवार करते हैं (ये सब 
मुसल्लमान है, ४२ लाख ६३ हज़ार, सब मुसलमान, लकड़ी, 
बेत और थटाई बनाने का काम करते हैं ।) लाखों हिन्दू 
मर्ड्मशुम'री की शब्दावली में “निन्ध पेशों” मे हैं--बिलकुल 
, छुछ क'ते ही नहीं । उनस पहले उनके पूर्वजों, ने जो कुछ - 
किया, वही यदि वे करने में अलमथे हैँ, तो वे कुछ करेंगे 
ही नहीं । 

भारतमे कुल १४०४६६१३४ नारियोम से केचल ४४४४६४ 


हक 


लिख पढ़ सकती हँ--हज़ार में एक से भी कम । ३० 


श्द स्वामी रामतीथ- 


करोड़ की कुछ आवादी में से अपढ़ी की सारी संख्या २७ 
करोड़ ६५ लाख ४६८ दज़ार १ सो पछत्तर दे इदे है।... 
इं० १६०० में ५ करोड़ ४० लाख मलुष्यों पर दुर्भिक्ष का 
प्रभाव पड़ा था । द्रवार के साल में ५० लाख भु्खों मर गये ।' 
जीवन के लिये संग्राम प्रति वर्ष भयंकर होता जाता है।. 
शीघ्रता से उन्नति करते हुए उद्योग-घंधों, रेलो का ब्यूह,: 
तथा दौलत और काम काज के अन्य साधनों के बढ़ने पर 
भी मजूरी का निर्ख बढ़ने के बदले घटता जाता है। 


,.. भारत में २० करोड़ से अधिक आदमी पांच, पेसे रोज़ 
से भी कम पर निर्वाह कर रहे हैं।१० करोड़ से अधिक 
तीन पैसे रोज़ से कम पर जी रहे हैं, और ४५ करोड़ से 
अधिक एक पैसे रोज से भी कम पर बसर कर रहे है।, 
पूरी आबादी के कम खे कंम दोतिहाई भाग को अपने जीवन , 
के किली भी साल में उतना काफी सोजन नहीं मिलता. 
जितना कि मानवशारीर को पोषण के लिये आवश्यक हे। 
देश के अतेक भागों में कुदुम्ब औसत में एक्र चोथियाई 
एकड़ भूमि पर बसर करने को लाचार हैं, तथा और लाखों 
आये एकड़ भूमि पर। स् ] 
... भारत के रुई के खेतों में जो नारी और नर काम करते 
ई उन्हें ५] रुपया महीने से अधिक नहीं मित्रता । एक पेसा 
इजामत बनवाई दिया जाता है। सरकार के नोकर डाकिये, 
सिटी ले जोनवाले,अधिकल अधिक केवल १२|८* मासिक पाते 
हैं, जो लगभग ३ डोलर के वरावर है। हृद्टे कट्टे भौर 
इोशियार कारीगर, मेमार, यढ़ई, और लोहार ८) या 
१२) रु० महीने से अधिक नहीं पाते, ओर सुनौम, शुमाश्ते 
तथा अन्य लोग, मकान के भीतर के पेशे चाल १६] से ' 


भारतवर्ष के सम्बन्ध में तथ्य ओर आंकड़े. १७ 


२४) रु० महीने तक पाते हैं। भारत के सब मजूरी कमाने 
वालों की एक साथ कर लिया जाय ते| डनकी माहवारी 
आमदनी लगभग ठीक उतनी ही है ज्ञितनी अमारेका के 
उसी दर्ज के लोग एक दिन भे पाते हैं । 


सारी आवादी का द्येतिहाई भाग अपनी सम्द्धि के 
लिये जलबृष्टि के सदारे है, और यह भी कहा ज्ञा सकता 
है कि, अपनी ज़िन्दगी ही के लिये वह जलबृष्ठि के सद्दारे 
हैं| यदि पानी वहां न बरस, ते दुर्मिक्ष पड़ज़ाता है।चे 
काफी नहीं कमा सकते कि दुर्भिक्ष के लिये अन्न जमा 
कर सके | अन्न का अमाव नहीं, बहिक धन का अभाष 
दुभिक्ञजन्य व्यथा का कारण है, क्योंकि साम्रान्यतः 
जब भारत के एक भाग मे दुर्निक्ष होता दे तब भारत 
के अन्य भागों मे यथेए्ठ, आर कसी कर्भ, यथेष्ट से अधिक, 
अन्न पेदा होता हें। 


अग्रेज़ी सरकार की जो नक़द ( पक्की ) आमदनी 
रेल विभाग के एक सप्ताह (२४ मार्च १६०४ सप्ताह ) 
में हुई, चह ७६ लांख अमेरिकन डालर ( लगभग २ करोड़ 
४० लाख रुपये ) थी। यह निरन्तर बढ़ रही है । 


रॉक 
/ 


भारत में ६५ सेकड़ा सरकारी नोकर भारतवासी हैं, 
ओर सरकारी नोकरों को जो कुल रक्तम तनखाह में मिल्तती 
है उसका केवल ३४५ सेकड़ा उन्हे (६५ सेकड़ा भारतवासी 
सरकारी नौकरों का ) मिलता है, ६५ सेकड़ा रकम ५ खेकढ़ा 
अश्रेज़ सरकारी अफसरों की जेब में जाती है। 


समस्त विदेशी धर्म अचारक समाज ( ई07शंहए 
ग्रांहशंणाक्षा'ए 8026068 ) की आमदनी सन्‌ १६०३ ६० में 


श्द्ध स्वामी रामती्थ. 


२०२५६८०४५७ डालर थी । यह प्रायः भारतवर्ष में ख्ची 
जाती है। 


भारत में वृट्टिश पूंजीवाद का प्रारस्म ई० रद००म 
भारतवर्ष में ७० हज़ार पॉड की पूंजी से इस्ट इंडिया 
कम्पनी की स्थापना से हुआ हैं | इ० श्प्श्३े म॑ इस्ट इाडया 
कंपनी का व्यापार वनन्‍्द्‌ हो गाया। उस तारीख से शै८४८ 
तक कस्पनी केवल सोरत का शासन करती रहदही। शप्शफ 
में, भारतीय गदर के बाद, खुद कम्पनी की ही -समाएण्ति 


होगई । किन्तु उसकी नीति जीवित है। कंपनी का. सूलघन 


ऋण! से चुकाथा गया, जो भारतीय ऋण चनाये गये, 
जिसका व्याज़् भारतीय टेकसों वा करों से चुकाया जाता 
है। सप्नाट ने ईस्ट इंडियां कपनी सर साम्राज्य खरीदा 
था, किन्तु भारतवासियों ने खरीद का रुपया दिंया। 
भारतीय ऋण, जो १८४७ में £ करोड़ १० लाख पाउंड 
था, १८६२ में बढ कर ६ करोड़ ७० लाख पाउंड हो गया। 
तहुपरान्त शान्ति के जो ४० साल वबाँते है, उनमे भारतीय 
ऋण चरावर बढ़ता ही गया हे। १६०२ में चह २० कड़ोर 
पाइंड था, जिस पर भारत के लोगो को हर साल ३० रद 
४० लाख पाउंड, या डेढ़ करोड़ से करोड़ डालर तक, 
' ब्याज का देना पड़ता है।यह एक अरब डालर के ऋण 
के वरावर की रकम दे जिस पर उन्हें (भारतवासियाँ को ) 
व्याज देना पड़ता है। दुनिया का कोन देश इस तरद्द के 
से भार को सद्द सकता है? भारतीय राजस्थ (माल- 
गुजारी, 7६ए०प९) से जो घर खर्च ( स्0ता९ 0मप-2०8५ 
सरकार द्वारा विज्ञायत भेजी जाने वाली रकम ) इंग्लैंड 
इर साल भेज्ञा जाता हे, वह बढ़कर १ करोड़ ६० लाख 


क् 


पत्र सजञ्जूबा । 
पुष्कर, 
जिला आज्ञमेर | 
२२ फरचरी १६०४३) 
परम अन्य, प्रिय संगवन, 
' जहां राम है वहां का जलवायु केला छुन्दर है। प्रत्येक, 
८ 3 ्ि कक के कि ३ 
दिवस नववर्ष-द्विल हे, आर प्रत्येक रात्रि बड़े दिन 
* कप शो ८ तप 
(00॥795798) की राज्ि है । नोॉला आकाश मेरा प्यात्षा हे 
७ 4 4 जे 
शोर जगमगी रोशनी मरी मद्य हे । 
पहाड़ों में में हलकी हवा हूँ, नीचे कुखबों ओर शहरों में 
रे रन कर भश आऔ॑आ 5१ हल 
में रंग ज्ञाता हँ--ताज़ा ओर सब खड़को से में पूणे रूप रे 
फैलता हुआ गशुज्ञरता हूँ । 


9689 जाप 76, ह0॥ | एप ; 

क्‍90ए0॥ एग0 706 ॥70प९7 4॥6 (ं#॥ए | 

0 700९ (06 भांशए 800 जछ्08 7 48 झ९ं07 
7पष्टी 707' 08ए, 

32989) धृरां80ए,.. 7888, ]0888 0६ ्षतए 7707.8, 

परत00 एशग58$ 70 ]0988, 

3 00 &॥। ४678 [70प0 एफ ; 

| #णेपे ॥6 १6७६ ; 

२06 ४ए (6 एशी0एछ हप्चा08 707 ६6 ॥|ए७ (७९७, 

डिपो 79 99 6७76, हए रक्का। 00 प९हा8, 


पत्र मेजूपा. श्र 


मनुष्य को में छूता हूँ,ओर स्त्री को में छूव। हँ--ऐसा मेरा 
आझीलामय मनोरच्जन हे | 

में प्रकाश हूँ, बड़े स्नेह से में अपने वछचो-फूलों ओर 
पौधा- को पोषता हूँ | खुन्दरों ओर बलवानों के नयनों ओर 


हर 


छुदयों में में रहता हूँ। 
मेरे खाथ ठहरो, तथ ४ पाथना करूंगा, 
है| मेरे साथ दिन भर 
आर रात भर भी, ओर वहां भी जहां न दिन हे 
और न रात, 
घुपक्के चाप रहो | अब फिर परे न जा, परे न जा। 
लुम परे नहीं ज्ञा सकते । है 
में भी वहां हूँ, जहां तू है; 
भें तुझे मज़बूत पकड़े हूँ, 
न तो पीत बालू में ओर न गंभीर नील में, 
केन्तु मेरे हृदय भें, तेरा हृदयों का हृदय है । 
प्रकाशों के प्रकाश में रहने ले रास्ता आपदह्दी आप खुल 
जाता है। व्योरे का ठीक ठीक व्यापार अनायास द्वोता है 
( गुलगव की कली की बन्द पंखुरियों की तरह ) जब कि 
भक्ति ओर दिव्य बुद्धि का खुखकर प्रकाश स्वतंचता से 
चमकता है । 
आशा की जाती है कि “धडरिय डान” (एएघ्ावेश- 
९8 407) का जनवरी का अंक आपने मिस्टर पूर्ण 
खूतरमंडी, ल्ाहोर से पाया होगा। 


आपका अपना आप 
स्वामी राम तीथे। 


श्र स्वामी स्वातीयथे, 


जनवरी के अक में आपकी कविता कमलानन्द के 
नाम से भ्रकाशित की गई है, जो कि पूर्ण स्वामी (संन्यासी) 
सास है । अब जब तुम और नये लेख से जोगी,तो वे '3० के 
नाम से छाप ज्ञायगे, यदि आप पसन्द कर । 

प्रिय महामाग गिरज्ञा तथा सब को प्यार, आशीर्वाद, 
आनन्द, शान्ति | 


38४ | ७5 [| ७४ [!! 
57558, 
मफण्त॥ 096 खंरालाइ8, 2687, $887-80एप एथऐड एग 
(2 2: १ (८4 हि 
0ए९४७ 606 76 868 8 पादप ए७७, 
पच्च 06 #ा४ए४ पा शऑ>धा।! ७8708 (6 ४006, 
८४ एए0०॥078 ६000 08 88 $6ए ७7४ १ 7/॥ए8 88 ह69, 
४ पआन्रीत20व 0ए 6 झं॥00068 70ए770 ४69, 
«४ प905807800९8 99 +6 2॥8 ह6ए 886, 
# [686 तेशाक्रादे ग्र0ा, 89 8 088 एांपर0प 
गाशा 
ि00 ६86७7 0ए8, का्प्रःश॥67, 8900/009, 
४ 890 जप [0५ 6 #बरएड ए9७ए00०7 विलंए छ्ंगह, 
* 870 ६8 869 73 ]009 7007-8ए878ऐ 70 ; 
“ छोतए 80-00 866 ६069 [ए68, 807 7708 छत आ०7॥8. £ 
४ 8] 406 76ए९7९ 07 8078 ती॥077४ 5०ए४. 
-* (0ए7त08त 0ए ह७05७ए6६४ छावे प88७7१+ पे 
# हक एा४ 8806 00878 069७ ए0"7 708ए 09७ 
# [छह धाशंए' 0७7 ईब878, थी! गाशं।' 90ए87/8 (0प्रापंगह, 
0९४६ बिक 86 787 ॥6 एणए 88०.?? 


पत्र मञ्जूषा, श्३े 


नक्षत्र । 


प्रचएड, निर्मेल, तारों से बोये हुए नस मंडल से । 
प्रकाशित सागर के अशान्त मार्ग के ऊपर, 
रात्रि की भमरभराती हवा से आवाज़ आई, 


“क्या तू होगा वेखा जेस वे है? क्‍या उनकी तरह 
तू रदेगा ? 


24 


“अपने इदेगिदे के मौन से वे निडर हैं, 

“ज्ञो दृश्य वे देखते हैं, उनसे निराकुल हैं। 

“से मांगते नहीं है, पर उनसे बाहर की बस्तुएँ, 

“उनको प्रेम,मनोरंजन,ओर सहानुभूति अपण करती है । 
“झोर आनन्द से तारे अपना चमकने का काम करते दूँ, 
. और सागर अपना दुर तक चन्द्र स रुपहला लहराने 


का काम करता है; 
“क्योंकि वे स्वयं समचित रहते है, 
“किसी मिननमत अच्तः/करण का सम्पूर्ण ताप देख कर 


नम 


छीजते नहीं हैं । 
“अपने आप से परीमित और 
धपरमेश्वर के दूसरे काम की हालत से वे परवाह 
अपने ही निज्जी कामों में, अपनी संस्पूरो शक्ति ढालते हुए 
वे उस महान जीवन को जिसे तुम देखते हो पाते हैँ । 


घ्छ स्वामी रामतीथथे- 
82 | 
लाहोर, ( भारत वर्ष ) 
२४ जुलाई, १६०४५. 
कल्याण स्वरूप ! 


/ रे हे िफर कह पु 
राप्त उत्तरी हिमालय के घन वनों में है ओर उस का 
अन्तिम पत्र निसत लिखित हे,जो संक्षेप में राम विषयक सब 
समाचार दे देगा-। 


“दिन रात में समाप्त होता है, ओर रात फिर दिन में 
चदल जाती है, ओर यह आप का राम है; कि कुछ करने 
को जिसे समय नहीं। कार्य-व्यग्ने (0089 ), कुछ नहीं करने 
में व्यत्न । आंसू बद्ा करते हैं, इस अत्यन्त वर्सोती ज़िल की 
निरन्तर बषो से अच्छा सुकावला कर रहे हैं। रोमांच होते 
हैं, आँख फटी अपने सामने की कोई चस्तु नहीं देखतीं ! 
बातचीत बन्द है, वदनसीची स काम बन्द हो गया ? नहीं, 
चह्दुत दी खुशक्लिस्मती से | अरे ! मुझे अकेला छोड़ दो । 

गदूगद्‌ परमानन्द क्री यह निरन्तर तरंगमाला। फऐे 
प्रेप | इस चलने दे । ओ | परम रुखचिकर पीड़ा। 

2 एक फय एणपंधंगष्ट ! 

(0 जग 486एए ४४ ! 

(200 ए00 #8/6 0॥0 79806 ! 

सकाण्पा8।! ०78९75९. 

725287208 ! उाश्त्ातं2685. 

278 76४४ ६0ए8 6 ७४० 07 ]76 $ 

90शा6 बगते 8060808, क6 9007" उप्राष्टी ०४5! 

७ पीछा 866 पा6 800 9986 ०पा'8१ दाशंए 070॥6893, 


पत्र मच्जूषा, २४ 


हुक 68४88 8 88078वं 5प्र7'९मां 09५, 
वुव एंथए४पीत९58, स0 870ए8 #एते 870एछ४8, 
१8 ॥ 068, 4॥ 0ए९7098 |8 97775 
00£ 8९0888 कषा)पे 06 707 78008. 
व 89769058 |7 2! ६6 ए07ेते ७90 ॥0ज़ह8, 
४ प्रणतातेक्ा68 40 छगोते #९908९. 
00 वी098, 06 9ता, ॥0 तैए 7086, 
की07 ह8 806 ए7ए8788 ,00 7'0]], 
2. 0॥त5 छातते तै९8॥8 707" (98. 
मसछा& ९णाह5 8पएछएए ए0०0प67 
पतंग 8॥85, 
86008 ९०7068 70॥#8 8प्रश॥७7, 
है 0 


लिखने से दूर ! 

व्याख्यानवा ज्ञी से परे ! 

कीर्ति ओर नाम से कोई काम नहीं । 

सम्मान ! बाहियात । 

अपमात | निरथक | 

कया ये खिल्लोने जीवन का उद्देश्य हैं ? 

तके ओर विज्ञान, विचारे प्रमादी ( गड़बड़- करी ) ! 
उनको मुझे देखने दो और अपना अन्धापन सिट्ाने दो । 
स्चप्नी से एटा पावन घारा बहता है, 
जागृत अवस्था से बद्द बढ़ती ओर बढ़ती है 
कभी-कभी वह ह 
इन्द्रियों और विनाशशील वलुके तटों से डउमछ जाती है। 
चह सस्पूर्श संसार में फेलाती ओर बहती ह । 


् 


२६ स्वामी रामती्थे. 


उद्दाम ( ७१0 ) शान्ति में चह प्लाबित करती है। 
इस के लिये, सूर्य नित्य उद्य हुआ, 
इस के लिये विश्व ज़रूर लुढ़का, 
सब जीवन और मौत इस के लिये | 
यहां आता है जोर स कल्लोल करता हुआ विस्मय रूप 
-< . तरंग्रित कल्याण | 
यह आता है गरज़ता हास्य रूप मोन । 
नब्न्नन-ईफ०न लव 
श्री: 
र्टलेंड ओर, 
श्रीमती ई. सी. कैम्पवेल, 
डेनवर, कोलेरेडो । 

जब लोग किसी वस्तु पर अपना दिल लगाते हे, ओर 
विघ्न पड़ता है, तब दे व्याकुल ओर बेचेन होते है। प्रतीत 
दोने वाली चुराई के प्रतिरोध करते की पद्ुत्ति, बिना अपवाद 
के, संच्तषोीभ ओर उत्पात का कंरिण है। इस प्रकार, क्‍या 
आप नहीं समभती कि दृजरत ईला का सिर ठिकाने पर 
, था जब उसने कहा था के “अखत्‌ वा पाप का भात्तेराध न 
करो", ! अपने आप की शान्त, बिलकुल खुश रकखो, ओर 
अपनी इच्छा की धारा के विरुद्ध जो कुछ . प्रतीत हो उसका 
उल्लासपूर्मयक स्वागत करो । जब हम अपने चित्त की 
स्थिरता नहीं नछ्ठ होने देते और स्वरूप ( आत्मा) में 
केन्द्रित रहते हैँ, तव, राम ने सदा अपने निजञ्ञी अनुभव से 
देखा दे,कि प्रतीत होने वाली चुराई भल्ाईम बदल जाती है। 
फ्या तुम्हें याद नहीं हे कि एक भतीत होने बाली चुराई के 
बाद वह दश रुपये क्विस प्रकार एक हिन्दू दिद्यार्थी को 


पत्र मच्जूघा. जज 


भेजे गये थे? किन्तु बद्मिज्ञाजी और वेखेनी से सब 
कल्याणों, उत्कृष्ट विचारों ओर हमारी राह देखनेवाली खुश 
नसीधियों का द्वार हम अपने लिये बन्द कर लेते 6 | सब 
बुराई और कठिनाइयों को उस चित्त से जीतो ओ देद और 
सांसारिक जीवन को अपने हाथ की हथेली पर लिये हुए 
हो; दुसरे शब्दों में,प्रेम पूर्ण चित्त की अंरपण करके, ( जिससे 
बढ़कर कोई उच्चतर शक्ति नहीं हे ) आप हंस दोष को 
ज्ञीतो । ३० ! 


तुम्दारा अपना प्रियात्मा 
2 ॥५०.*| 
राम स्वामी के रुप मे 


पोटे ल्ले र। 
श्रीमती ई० सी० केस्पबेल, 
डेनवर, कोलोरेडो । 
आप निरन्तर राम से याद की जातो हो। 
85 ] 82 |] 3४ |! 
आप अति सच्ची, पवित्र, अष्ठ, एऋशग्नचित्त, श्रद्धालु, 
ओर बड़ी ही भत्ती हो ! क्या ऐसी नहीं हो ं 


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श्य स्वामी रामती्थे- 


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07 (70प06,  007 ! 


१.सन में एक मनुष्य की दूसरे से तुलना या 
मिलान करना । 

' २, सनसे छापने आप की किसी दूखरे ममुष्य खे 
तुलना करना। न 


चतेमान का भूत से मिल्लान करना ओर पिछली 


भूलों की याद में रंज करना । ४ 
४. भावी तरकीयों के मनसवे करना और प्रत्येक 
बात से डरना। 


४. एक परम तत्त्व वस्तु के लियाय किसी ओर चबर्तु मं 
चत्त लगाना । 


६. बाहरी झूपों ( दिखलावों ) पर आश्रय करना और 


३० स्वामी रामतीर्थ- 


तक हम दुनिया के सब रोगों को निमंत्रित करते हैं । देदद 
आओऔर उस के भावों को भस्म कर दो ओर तुरन्त हम 
अद्वितीय वादशाहत भेगने लगते है । 


प्रण्व्प ! तण्ाफ्रत्म्त ! 

3४० ]88009, 70 ९७)!" ; 

एक हा त287/९50 0 6 88) 
3९० 997. 00 8077'0ए ; 
“९० [8४६ 70 77077'00, 


| जय | 

।ई डाह नहीं, काई सय नहीं; 
प्रियों में प्रियतस हूँ । 

हं पाप नहीं, कोई रंज नहीं; 


न अतीत, न (/आगामी ) कछूह है। 


आर 3॥ 4 


4]6 |९बरभाहते 77॥8॥788 एांत गक्ष7-8.॥7॥7 ॥6805 
870 0707४70०॥६ 9९॥॥68, 

406 ४6९४९ ९१ 7770688078, ॥४0ग्रांडंगहु 6779॥0- : 
0९ 87607 97 66 ]&0007'8&007'7 00' [96 0980- 
शधा07५ 

पल एद्चा'रनाएकतेशत 0करा0ण'8 #पीयंगए वेपयं शरथंए 
घादीं६008 (707 ४00 9पाजाड 00 0]8[/07779, 

ऊर्शा 6 9007 जलती व 08 007फ शंत्रा8 07 0ा6 
रंधते 00 8700 &' -- 


| ४656 | धागा. , 
॥]6 68५678 &00 8878, 
005, ग़्९'॥' छग्मते ईछ', 


पत्र मज्खूषा. ३६ 


खै76 पाए ध्ातं 8४ प्रा 
(27 #06 प्रश68 व इप्रा्ठ 
जै४० 2ए६7, 70 08; 

0 व ंधा'ए, 70 एछ06 ! 
स्‍९०, 7008 0०पँदे कक्वापा ए&. 
९0, 7007708 8शक्षिपा प्र९. 
प११७ 80पग ०॥ 7, 

प॥8 आ6८ ४7-97, 

08 8७छ86(8४६ 96), 
९०७ ! ॥९0॥॥ ॥80७॥[, 
496 77778 807९8॥79, 
पुप6 90|ए656 078ब75, 
2. 779777 कवराव0 08॥7, 
पिकजका। #गरपे 09॥8, 

80 एप्र7ं8, 80 ९७०, 

50 4, छाए | 


बाल की खाल निकालने के मस्तिष्क ओर निकले (फूले) 
हुए पेट वाले विद्वान महात्मा, 

प्रयोगशाला या वेघशाला में सरल विद्यार्थियों को चकित 
करने वाले चश्मेधारी अध्यापक ( ?7'076858875) , 

* अपनी वेदियोँ या आसनों से अपने श्रोत्ा-समुदायों फो 

सुक बना देने वाले नंगेसिर व्याख्यान दाता, 

एक या दूसरी प्रकार की शिकायतों से परिपूर्ण दीन 
अमीर भी १-- 

थे सब मे हूँ । 

आकाश और तारे, 


३२ ,. स्वामी रामती 
निकट ओर दूर लोक, 
मेरे गाये स्वर पर; 
लटके ओर चंधे हैं, 
न कोई प्रतिहन्दी, न शत्रु ! 
न चोट, न क्लेश : 
नहीं, काई वस्तु मुझे हानि नहीं पहुँचा लकती। 
नहीं, मुझे काई नहीं डराता। 
खब का आत्मा, 
अम्तृत-स्लाव, 
मधुरतम आत्मा, 
हां, खुद तन्द्रुस्ती । 
मषकी नदियां, 
रुचिरतम स्वप्न, 
सव गन्धरखसख ओर उुबन्ध्रित प्रल्ेप, 
राचन ओर राम, 
अति पवित्र, ऋति शान्त, 





में है, मे हू । 
' रास ! 
30 कच्चा 
8० ] 
द्ध ! आशीवाद ! . शाहन्ति प्रेम ! 


॥ 
३० छागरुत १६०४ | 
परम ऋ्याण स्वरूप शियत्म, 
तीन महीने तकू रूम पक पदाड़ की चोटी पर था 
( लगभग ८००० फुट ), जो संसार के सर्चाच पद्दाड़, मौंद 


पत्र मेजूषा, डरे 


पवरेस्ट (४६. ॥0767९४४) शिखर के सामने है । परसों नि 
मेदान को उत्तरूंगा। पाँच पुस्तके यहां लिखी गई हैं, ओर 
बीस पढ़ी गद हूँ । 
राम का मन हष और शास्ति से लबालब भरा है। 
संसार मानो मन से बिलकुल ग्रायव हो गया है । 


(७0०9, ७0०0 9७076 
अप0ए ए़686 | 
47779, क्ा॥0प 
कीच, 800 70087' [ 

() ]0५9 [ 
वात हु 9९७०७ ! 
वृागताबाएंधएहु 2755 ! 
080 8 ॥68ए७॥! 


परमेश्चर, परमेश्वर केवल 
सर्वत्र ! 
भीतर, बाद्दर 
दूर ओर नगीच ! 
अरे आनन्द 
सनसनाती शान्ति । 
सहराता कल्याण । 
कैसा स्व दे ! 
शान्ति 4 क्यास 4 प्रेम | 
आध्यात्मिक, मानसिक ओर शारीरिक स्वस्थता, 
पर जो कुछ कल्याण रूप हे, वह सब 
मिरजा, ओम, चम्पा, ओर दूसरों को जो तुम्दे प्योर हैं, 
पाष्त दो । 


ब्ेछ स्वामी रामतीर्थ. 


26६०९ 70008] 8 88 एथंए 60.08, 

शल्लंबाण १8 वैए0एए92 7 ए्रप्छं6शं एथ४, 
एछंग्णा० । 0ल्‍गगो6!| 3ंव्टों8 | 

ए ००पवे8 0 हरी07ए, गि6ए गाल) 80 एुछए ! 

पृणा6 ए़णगत8 88 तंभाणप्रव5 त00 #700 #07॥, 
ए्एंश्शू8 ! 7758208 ! 7)" 5826 ! 


१४ 797686४९४ 0० ॥,8एछ 90छ 7रगज्ञागरंदशं जाएगाएंठतों 
4,0 ! ६078 +9] [76 0060908, 08ए68. 
एएड206 ! )जंव्छो6 ! ।)प228, ] 
3ए 0000५ए 976०४, (08 778826 ० 7,8ए, 
छा0ज8 78४४४ | 9ष्थपएेपों | 


50798 98085 हांग8 &06 898५9 2776 एफ 85, 
40व 00078 76 06 66ए७0०7०७७ 79], 
॥)४9886 | ॥)पंटर6 ! 370४6 ! 
0ए ९780४#णे ॥20॥, 9 869 0: एशो8, 
8707 00९88 04 770, ३६ प्र ए७(88. 
६ 7४09/68 5040ए, 8070ए, 80707; 
070 0060 76 0९७६8 0ए६ छ0०ए[त5 0६ 89785 ! 
3 800एछ60 4070) (6 ४६४08 85 8]078५ - 
छएजएट6 | फंण्णो6 ! ज॑ंश्ण० | 
6548. 
()7 ! 070 | (7 ! 


अमर शान्ति भरती हे जैसे पानी वरसता है। 
संगीतमय दृष्टि मं अस्ृतवपो हो रही है | 


चाद् मंद २ दृष्टि ! वाद मंद २ बष्टि !! वाह मेद्‌ २ बष्टि ॥| 


पत्र मंजूषा, ड्ेह , 


मेरी महिमा के मेंघ, वे बड़ी प्रफुहलता से कूच करते हैं! 
उनसे हीरो के से संसार बरसते हैं। . 
चाह मंद २ वृष्टि, चाह मंद २ वृष्टि ! वाह मंद २ वृष्टि ! 
रे क़ानून के ककेरे तालबद्ध चलते हैं, तालवबद्ध । 
देखो ! राष्दीं। का पतन पंखुरियों, पतियों के समान 
होता दे । 
चाह शीकर चृष्टि | वा शीकर दृष्टि ! वाह शोकर दृष्टि ! 


जा, 


मेरी खुगंधित सांस, क़ानून की सदुपवन हुई, 

केसी, सुन्दर ! सुन्दर चलती है 

कुछ पदार्थ भूलते हैं ओर डालियों की तरह डोलते हैं 
ओर इसरे ओसख के कणो के समान झरते हैं । 

चाह मन्द २ वृष्टि ! बाह भन्द २ दृष्टि ! वाह मन्द २ बृष्टि ! 


मेरा मनोरम प्रकाश, श्वेत का एक सागर, 

दूध का एक सागर, वह लहराता है। 

उसमें कोमलता से, कीमलता से, आंति कोमलता से 
तर उठती हैं 

आर फिर वह फेन के ससार विछा देता है ! 

में नक्षत्रों को फेनक्रे रूप में बरसाता हूँ / 

चाह मंद २ त्ृष्टि । वाह मंद्‌ २ वृष्टि ! वाह संद २ बृष्टि् 

७४ | ३० |! ३४ !]] 


चर स्वामी रामतीथे. 


केः छू # 
पुष्कर, ज़िला अजमेर, 
( भसारतबधे ) | 
आनन्द | आनन्द | आनन्द ! 
शान्ति ! कल्याण ! प्रेम ! 
आनन्द ! 
परम प्रिय और परम कल्याण स्वरूप, 
पक शान्त, स्वच्छ, ओर गहरी गहरी झील के तट पर 
राम रहता है । एक ओर एक लस्‍स्वी, समाकार, अविच्छिन्न 
पहाड़ी फेली हुई है, जो सब कहीं झुन्दर हरा दुशाला ओढ़े 
प्रुए. है । आम-कुछ्ज यहां वहुतायत से हैं। जिस मकान में 
राम रहता है उस में दो! छोटी फुलवग्गियां हूँ । अति खुन्द्र 
भोरों के कुंड अपने घातुमय गलो से शोर मचाये रहते हैं | 
बत्तख खल खल कर भील में तेर ओर गोते लगा रही है । 


[4 5 


नारायण स्वामी ( सुन्दर युवापुरुष जिसकी चर्चा शायद्‌ 
रामने तुमसे की हो ) यहां राम के लेखों आदि की नक़ल 
ऋरके राम की सहायता कर रहा | 

भील का नाम पृथिवी-नेत्र है । ज॑गलदार पद्दाड़ियां ओर 
चोटियां फील की लथकती भोददे ( भरने ) हैँ । यह चह दर्पण 
है जिस केई पत्थर दरका नहीं सकता, जिसका पारा कभी 
न छुटेगा, जिस दर्पण में उसे भेट की जाने वाली सारी, 
मत्वीनता ड्ूब जाती है, जिसे सूर्य की घुंधली भाड्ू चुदारती 
झौर साफ करती हे--डखका यह प्रकाश ही काड़न- 
कपड़ा है। 

यह भील श्रत्यन्त गोरवोम से एकहै,कि जिनको राम मिल्रा 
है ।किस खूची स यदद अपनो विशुद्धता क्रायम रखती हे! 


पत्र मेजूषा. श्छ 


इस की सम्पूर्ण तरंगों के बाद इस से एक भी क्री नहीं 
'यड़ी है। यह सदा जवान यनी रहती- है । 
हमारे हृदय ऐसे ही हो । 
35 | ३४ ! 
गर्मी में राम शीतल हिमालय पर चढ़ जाता है। 
(6 छ९७ छापा हरए ते00॥ 5९९७ ६0 शा०फ़ 
ह 30 #8कप्रातपों ऐणंशोा ; 
“8 7 ६6 5ि0म्न शा 779768 76 50 १ 
5प्रए९४ए ईए 8 0ए ॥98॥. 


पश्चिमी आकाश चमकता जान पड़ता है 
इतना सुन्दर चमकीला; 

क्या सूर्य उसे ऐसा बनाता है? 
अवश्य ही यह तेरा प्रकाश है; 


ऊमछः8 60-- 
उत8 ॥08 बाते 5378, 27०९७॥ 70080 8४0 7६४0, 
07 07007 79 ९प्रएए९वे [ंग्९5 67९७, 
रिक्वांए00फ8 7९ए९78४९९ 77079 9786 [0 £7€६ ; 
(07 878 !0ए9 ॥979708 0ए६४१९६, 
जिगर 807 88 4 ॥6ए 878 870 80०९९), 
979९8 0छ ॥86 80796 08४7६ फक्वा०४४०, 
570 (७76 70 7068 0# घ8 8६ 8|]. 


यहां अवश्य हैं +-- 

8 _ 
हरी पोशाक बाली झोर लाल, 
चिड़ियां लटकर्ती ओर भूलती, 


डंप स्वामी रामतीथे- 


या मानो ऊंघते हुए बक-रेखा म ऋ्ूमती हें, 
इन्द्रधज्गुप पेड़ स पेड़ तक आधे हुए हैं, 
या धीमी आवाज़ से नीचे सूंड किये लटकती गाती हैं, 
ऐसी केमलता से गाती हैं, मानो वे गाती ओर खोती दें; 
धीमे से दूर के जलप्रपात के समान गातोी हैं, 
आर हमारा कुछ भी खयाल नहीं करतीं । 
४थेडरिंग डान” ( अखबार का गाम ) फिर निकाला 
गया है | चार नये अक अब तक प्रकाशित हो चुके है । 
जनवरी का अक लगभग सारा राम की कलम का लिखा 
है । कमला की कुछ कविताएं भी कमलानन्द के नाम खत 
निकाली गई हें । ! 
भारतवष में कमला का एक सी पनत्न नहीं मित्ता । 
शान्ति, कल्याण, प्रेम तुम्ददे प्राप्त हो 
तुम्हारा निजात्मा 
स्वामी राम | 
प्यारे नन्हे ओम की 
हफे, हपे, हपे ओर गिरजा को प्यार । 
तुम्हें तैयार रहना चाहिए ठीक समय पर राम के पास 
आने को | समय आने पर राम लिखेगा । 
35 |- 
शास्ता सिंप्रग । 
२२ जुलाई १६०३, 
प्रिय कल्यणिनी चम्पा ( फ्लोरा ग07'9 ), ह 
शायद्‌ इस तरह सस्वोधित होना तुम्हें पसन्‍्द्‌ न होगा | 
किन्तु तुम्दें यह भावे यान शांवे, राम की रुचि तुम्दे इसी 
नाम से पुकारने की है। पूते भारतीय ( हिन्दु) की भाषा 


- पंच्न मेजुषा. डे 


में दर नाम का विशेष मद्॒त्व है, और चस्पा नाम ( साधार- 
णुतया अ्रष्ठ ओर उच्च कुलों की लड़कियों का यद्द नाम 
रक्‍्खा जाता है ) का शाव्दिक अर्थ हे, मधुर छुगन्ध वाली 
पूरे विकसित सफेद मालती ( पुष्प ) । 
यह चिट्ठी लिखने को ज़ब कलम द्वाथ मं ली गई थी, 
ठीक तब स्वभावतः ओर अनायास यह नाम राम के ध्यान 
- में आ गया | अंग्रेज़ी मं इस का अद्चर-विस्यास इस तरह 
हो सकता हे-0007779 या (प्र॥8 । 


उस दिन तुम्हारे प्रश्नां के उत्तर मं एक लम्बा खत 
कमला ( पोलिन ?०प्र76 ) को लिखाया गया था। क्या 
तुम्हे उस की चिट्ठी मिल्ली? उस में राम की अभी की कुछ 


काव्य-कृतियां भी थीं । 


'2४८८०७४१६४० 078०८।७7१5% 
3 एछवे7076 फिक्षाशणा शराहए 928 5प्राएढते पए 7 
$98 8726 8077787 476४7-- 

/ [९९9 3078९ 9060॥9 ॥899 के 8६ 788६, 
70780 एप ॥80]005--छ 2६९88, वैं९&(0, 00॥8- 
87, ९0प्र॥79, ०0" घाए पंए? . 

(86 06९: प बाते 8६ 98806 09 ४86 8707्०९ 07 


छ007 प0०वकाधबते ॥0 जोशी पत्ता शीकी। 8ए९ए 06 
फप6. 7 


2 पगुफ& ए0जत -व85 7#शत्रा४8, ॥छ600॥5, क्षाएे व 
"786 एांडही।79 वृप॥7 685 47 ए0प 778886 ६0 
98586 6 उक्षु8४:ए 07 ए0ए7' 76७ ठ6, 


४० मी रामतर्थि. 

॥#879९९०६ 0086"78, 20वे एक्वलांली] 00 0 धाजागरणट ३ 
एप १0 थी शार्शा 7 शी गष्ठीआ। 0 ए0प्ए 777७ 507, 
ए6 क्‍8 ॥0 899, 7078० गर05 शी ए0पाए डिश वध 
घ0ए९ हा] ॥86 शायर 06एण7वे ] ज़धाा, 


ए0०प #*धीए ऊ९चुणांए8 गरठतएंशआहु... शार शा0पेवे 
707 8९6 8 वेल्शं76 407 8&9ए9 ? 700 ए0ए० एफ 
जाग 6 27806 07 28 ए्राॉए्ए'इधो छिप्रोशा, 407' 988- , 
87786, 7, 07" 770'8 7रप5श॥6४8 8026... /९ए४०, 
ग्र6ए6० 4९७ 80 ए0प एक्षय 80908. 


3 फकशाशा ए०प ]ए४९०॥४68७ [7970]068 07 ए९००४॥9, 
8]00ग्रॉ7९0प8ए.. छत] गी6 8ज९७६४ 8078 
० परणयी। 970००९व 9 थी त7ए९४७४०॥४३४ +णाय 
ए0०प, 
(8670786 7978 8806९9 --शी606 6५०5 ७67 
$0 00056 -- ७ए००७ए 7870 07 3007 77876 & विफ 78- 
80]ए8॥7 ए0पा परांधते 80 जाप ए0ए8९ॉए 7 ९॥0०१4- 
शाह ० एछतेश्ाप्र8 पएएगी ता एश्ुरांप् पएछ. 
६ए॥७७ ए0प एशे९ प0,-087078 १0708 7।एपंगरट्ु 
शे5९, पा ऐ्रापतहु ॥0 एण7 एव जंशंवाए ॥06 0#60७- 
ग्राए00 (९; प०0॥ 068707'8 #कश8 280९०. 


ए्फशाएरशाः एठप ढक्का, वंपर् लावा 0. पा 0 
ए0786॥ 0073.” 


चेदान्तिक निर्देश । 
१, वेदान्त-धर्म एक अकेले सूत्र ( आदेश-वाक्य ) में 
सगदहीत किया जा सकता हे-- 


पन्न सेजूषा. ४१ 


अपने को बिलकुल खुश ओर निश्चिन्त रक्खो, कोई 
परवाह नहीं, कुछ भी हो-रोग, मोत, भूख, निन्‍्दा, या 
कुछ भी हो | 
अपनी परस्मेश्चवरता के आधार पर, जिस के प्रति तुम्हे 
सदा सच्चे चने रदना चाहिये, खुश ओर शान्ति में रहो। 
२. संसार, उस के निवासी, सम्बन्धी, तथा सब कुछ 
नाशर्शाल पदाथे हैं, यदि आप अपने चार्तविक स्वरूप की 
महिमा के हढ़ निरूपण की कृपा करे । 
आऑखिय, देखिये, और ताकिये या कुछ भी कीजिये, 
किन्तु यह सब कुछ अपने सच्चे आत्मा के प्रकाश मे कीजिये, 
कहने का तात्पय यह कि यह न भूत्रिय कि आप का आत्मा 
उन सब से ऊपर और सब अपेक्षाओं से परे है | 
वास्तव मे तुम्दें किसी भी वस्तु की ज़रूरत नहीं हे। 
तुम्दे किसी चस्तु की भी इच्छा क्यो हो ? सम्पूर्ण विश्व के 
शासक के प्रसाद से, सुख के लिये, खल या केवल मरोरंजन 
के लिय अपना काम करो। कदापि, कदापि न समझो कि 
तुम्हें किसो'चीज़ की ज़रूरत है । 
३. जब चेदान्त के इन सिद्धान्तो एर तुम अमल करोगे, 
तब सत्य की सघुर गंध तुम से निकल कर फेलेगी । 
सोने के पहले, जब आँखे बन्द होने लग, तुम हरेक रात 
या दोपहर को अपने मन में उृढ़ निश्चय करो कि आगने पर 
अपने आप को वेदान्तिक सत्य की साक्षात सूर्ति पाओगे | 
गले पर दूसरा काई काम करने से पहले सोते के पूच 
ठुम ने जो प्रतिज्ञा की थी, उले पूरे ज़ोर से अपने मन ने 
साओ । 


8२ स्वामी रामतीथे- 


जब कभी तुम से वन पड़े, 3» उच्चारों या अपने मन में 
35 जपो। | ५ढ - 

इस तरह से यथार्थ असली चम्प्रा की भांति तुझ 
कम 


मनोरम सुगंध ओर मनोहर प्रताप अपने चारों ओर दर 
समय फेलाती रहोगी। 


7.0पव 0प्रॉक्ापे९७ (बात एर०एावेड फोपंली 0208 ए०्पाएं 
तपार्ष दावे 8097, 

फर०ज़ 80प्रगपे 80 558४-6 ए्गरा5 07 ए7क्वांड8 07 
गांठ 5 7थाएरए छाप॑, 

0 हर, 0 887087/897,, 700087' तैंदन्व' | 

१,00६ श9%, 007९, एशए७०१०७, वृर्षोएए, 0 दैठए ए0ए 

ई९४7', 

379 886 व8 076$ ४77॥6 48 ॥7706, 

(९४, 47 ए0प (077६ 607६, 

37]९886 (726 8&ए'8ए हीर8इ€ फिीव्शु8 ए0प ऐगस्‍र 676 
7776. 

ए०३, ॥7 ए०प गंगा: 46 #, 

हिल 08 004ए &॥ 076 20ए, 

६)7' 8089 76 76 79ए 7, 

वंछा6 07 वाह 0049 बाते की एणा मक्का, 

96 07 एछ ग्रध्माआ6 का 0 06, &ए०५ए | 

पंधर8 07, 8एछ०ए ! 

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पत्र मेजूषा, ७३ 


ज़ोर का विलाप और घाव जो पहले कष्ट 
ल्‍ ओर पीड़ा देता था, 
अब पेस मधुर जान पड़ते हें -जैसे स्तुतियां 
. या पीड़ाइर नाद-कौशल के स्तोत्न | 


ऐ चोर, ऐ निन्दक, डाकू प्यारे ! 
जल्‍दी करो, आओ, तुझे स्वागत, शीघ्र करो, अरे तुम 
मत डरो। 

कप पर हल 3 4 जप रु 3 

मेरा-आत्मा तेरा है, ओर तेरा आत्मा मेरा हे, 

दे, वध ऋषण्य के कजेशः सा छह 

तो कृपया इन चीज़ों को ले ज्ञाइय जिन्हें आप 

9५४ कल डर 
मेरा समझते दे । 


हां, यदि आप यह ठीक समझते हैं, 
तो एक ही बार से इस शरीर को मार डालिये, 
या डुकड़े ठुकड़े कर के इसे क़त्ह कीजिये, 
देद ले जाइये और सब कुछ ज्ञो ले ज्ञा सको, लजाइये, 
दूर दो, नाम और कीर्ति लेकर दूर हो ! 
ले जाओ, दूर हो ! 
तथापि यदि पीछे घूम कर तुम तनिक देखो, 
तो केवल मैं सुरक्षित ओर व्याधि रादित रहता हूँ । 
नमस्कार | ऐ प्रिय, नमरुकार ! 
तुम्हारा आत्मा 


राम स्वामी के रूप में 


३० स्वामी रामतीथ. 
न्न् मम मम 6 ७ श्र 4 

स्वामा राम का भ्ज्ञां हुई टप्पांणखयों 4 

चदान्तिक साम्यवाद घटाने का सच्चा उपाय, दोंलत 
या दीनता की बिना परवाह किए, हमारा अब! ओर “यहां? 
का भोगना है, यहाँ तक भोगना कि अमीर हमार सामने 
अपनी गरीयो के असुभव करें ओर अपने अधिकार जमाने 
के भाव से ऊपर उठ । आज कछह के साम्यवादी सबसे 
चड़ी भूल यह करते हँ कि नाम मात्र के अमीर के अधिकार 
में जो समुद्र फन ( के समान धन ) है उस की एक बूँद 
के लिये, उन के भार पर करुणा करने के बदले वे डाह 
करते हैं। 

जिन का चित्त खुख भोग सकता है, वे नक्तओ से प्र्दाष्त 
उज्वल आकाश में चमकते हुए हीरो का खुखभोग कर सकते 
हैं, मुसक्याते हुए वनों ओर नाचती हुई नदियों से बहुत 
खुख प्राप्त कर सकते हैं, शीतल पवन स, सूर्यप्रभा ओर 

निद्रिका स, जिनको प्रकृति ने वे रोकटोंक हरेक ओर सब 

की सेवा के लिये नियुक्त कर दिया है अनन्त आनन्द लूट 


जिसका विश्वास है कि “हमारा खुख विशेष अवस्थाओं 
पर अचलम्बित हे, वे सुख के दिन को अपने से सदा परे 
हटते ओर आगया-वेताल की भांति निरन्तर भागते पावगे। 
जिसे दुनिया की दोलत कहा जाता है, वह खुख की साधन 
होने के चदले सम्पूरा प्रक्ति की महिमा ओर सुगन्धि को -- 
आकाश मंडल ओर अवाधित दृश्य को छिपाने के लिये 
केवल वनावटी परदे का काम देठो है। 


केाई कृत्रिम संगीत ऐसा नहीं है जो मनुष्य का सावः 


पत्र मेजूषा, ४४५ 


है; 

नाओ के भाकृतिक बहाव की-चह चाहे मोन अश्ुओं के 
रुप में हो, या एकान्त हास्य के, अथवा अकेले कावता मे 
डबड़बाने के रुप में हो--कर्ी भी बराचरी कर सकता है। 

सब कृत्रिम संगीत ओर विशेषतः फोनोग्राफ का संगीत 
बार बार खुना जाने से अन्त में कानों में खटकने लगता है, 
ओर आत्मा ( चत्त ) को स्थूल लोक में उतार लाता है। 

पत्थरों ओर कंकरा ( 0600768 ) के समान विसाग पर 
हम क्यो झगड़े ? 

दोलत नामक रोग के संपूर्ण अधिकार का दावा करके 
यदि अमीर कहलाने चाले लोग अपने को बेवकूफ बनाना 
चाहते है, तो कमला का इस में क्या विगड़ता हे। उन्हें 
' अपने का सूख बनाने को खुल्नी छुट्टी कमला का दे देनी 
चाहिये । 

हिमालय की एकान्तता । 
( अभी कुछ साल तक जारी रहेगी ) 

रुपहली शान्ति का सागर फेलाता हुआ चन्द्रमा चमक 
रहा है। राम क पयाल के विस्तर पर पूरी चांदनी पड़ रददी 
है। असाधारण रूप से लम्दी गुलाव की भझाड़ियों की. जो 
इस पहाड़ पर बेखटके निंबध्न उगर्त! है, परछाहियां चांदनी 
से प्रदीप्त विछोने पर चारखाना बना रही हैं, ओर ऐसे 
खिलंद्डेपन स लहरा रही है मानों वे शान्त चाँदनी के, जो 
चडी स्थिग्तास राम के सामने सो रही है, अति झुन्द्र 
छोटे स्वप्न हे । 


सेोज्ञा, वचचे, सोझा | 
ओर गुलाबी स्घप्तो से मन्द मन्द हँस-। 


४६ स्वामी रामतोथे 


खुन्दर, पवित्र तुपारपुञ्ञ (42678) इतने पास पास 
स्थित हैं कि मानों उन तक हाथ पहुँच सकता हैं। वास्तव 
में, अति दीप्विमान दीरकचर्णी चोटियों का एक अद्धेचन्द्र 
($९7भं-९7९४) जड़ाऊ सुकुद की भाँति इस आश्रम की 
शोभा वढ़ा रहा है | सब श्वेत वरफीली चोटियां चांदनी के 
'च्वीरसागर में स्नान कर रही हैं, ओर शीतल पवन के-ऋकोरो 
के रूप में उन की गम्भीर सोहम्‌ रूपी एवांस यहां निरन्तर 
पहुंच रही है | 


इस पहाड़ पर जितनी चरफ गिरी थी सन्न पिघल गई हे, 
और चोटी पर का विराट खुला मैदान जहां राम रहता दे 
चह्द अब नीले, लाल, पीले, ओर सफेद फूलों स बिलकुल 
ढक गया है, जिन में स कुछ चहुत ही खुगंधित हैं। लोग 
यहां आने से डरते हैँ क्योंकि वे इस स्थान को परियाों का 
बाग मानते हैं । प्रकति की खुन्दरता को नष्ट करने वाले 
देव-निन्दक' उन के नित्य के आंवागमन से यह स्थान इस 
कल्पना के कारण बचा रहता है) राम इस पुष्प-भूमि पर 
चड़ा कोमलता, वड़ी सावधानी से चलता है,. ताकि प्रकृति 
का काई कोमल, विहेसता हुआ छोटा बच्चा ( पुष्प ) राम 
की साधारण कठार चाल से चोटेल ( पीडित ) न हो जाय । 
कोयले, बत्तके, ओर अन्य अनेक पंखदार गवेये संबेरे 
( प्रातः उठते ही) राम का सत्कार करते है । गंभीर 
ध्यान, चेदों के अध्ययन, ओर घमे तथा तत्वज्ञांन पर 
लेख लिखने में राम का सम्पूर्ण समय इस ऊँच एकाल्त में 
बीत जाता है। आठ मील के भीतर २ कोई गाँव नहीं है ।. 
पद्दाड़ी के उतार पर, एक मील की दुरी में एक .सवक राम, 
का भोजन बनाने को रहता है। अनेक मद्दीनों तक राम ने 


- पत्र मेजूषा- ४७ 


न तो कुछ लिखा ओर न किसी प्रकारके पत्रों के उत्तर 
पदिये । खब पत्रव्यवहार त्याग दिया । 

के ( कमला ) ओर ओ ( ओम ) को भारतवपोे के लिये 
जल्‍दी न करना चाहिये। 

यथासमय उझुन्द्रता ले हरेक बात निकल आंबेगी, 
विना हमारी किसी प्रकार की चेसत्नी के । परमेश्वर की, 
सरह तनिक परमेश्वर मे रहो तो । 

२06 06 00079, ४0॥0 ६॥6 एएं४90. 

२० 7'080078, 70 ७0४7606008, 

(00878 ए०एए 56., 

37०72 0०६ 604 [58, 

र०णंणए 0ए ६०6 38 ए07" 80६, 

न देह, न मन, 

न नातेदार, न सेवंधी, 

झपने आत्मा का प्रतिपादन करो । 

इंश्वर के सिवाय और कुछ नहीं हे, 

आपका आत्मा ईश्वर के सिवाय कुछ नहां है । 

अति कल्याण स्वरूप गिरजा ओर चस्पा को शान्ति, 
कल्याण, आनन्द पहुँचे । 

राम के एक प्रिय कल्याणरूप मित्र द्वारा अजुवादित 
- अष्टाचक्र गौता इसके साथ ही पृथक पेकिट में भेजी 
जातो हे । ह 

परिच्छिन्तात्मा या व्यक्वित्व की हेसियत से कुछ न 
होने दो | 
हमें इस तरह रहना चाहिये जैसे देह इत्यादि का मानो कभी 
अस्तित्व ही नदीं था । 


छ्ठ८ स्वामी रामतीं. : 


एक प्राचीन चेदिक गीत ( मंत्र ) का आंशिक अनुवाद 
नीच दिया जाता है, मूल में एक हिन्दू महिला ने इस की 
रचना का था| 

४ जो कोई देखता है, या सांस लेता है, अथवा जो 
कुछ कद्दा जाता है, उस खुनता है, भोजन करता है, वह 
सब मेरे छवारा ( करता है ), पर वे इसे जानते नहीं है, किन्तु 
भेरे अधीन हैं । सब एक बार सुनो, यह ठीक ऐसा ही है। 


७4७७० ७०७७ ०+७ ७० % १०१ २०० ७७७०४७ 


झ सब खंखारों पर अधिकार जमाता हुआ में चलता 
हूँ जल हवा चलती है; भूमि से परे, आकाश से परे हैँ; में 
सम्पूर्ण शाक्ष हूँ । 

४ में कानून हैँ जो अनियाय हे, 


6 


सत्य हूँ जो रनिद्यी 
(निष्ठर ) है। में प्रकृति के लिये घत्भप फुक्राता हूँ ताकि 
डसका वाण उन लोगों को मार गिरावे जो परमेश्वरीय 
जाचन नहीं बिताते । 
_ सवग पर मेरों हुकूमत दें, इस शक्ति-शालो प्रथिव्री पर 
भे फला हू । 
मानव जाती की पार्थनाएं शाम के समय चन से घर 
को लांटते हुए चोपायों की तरह बंबाती हुई मरे पास ' 
इंचतला हैं । 
35 | 38% |] ४5 !!] ' 
पूर्ण के न म मसिज वैल्मैन का पत्र सहित उन सव प्ों के जो राम से 
समय २ पर सूर्यानन्द जी को प्राप्त हुए । 
प्रिय और अत्यन्त धन्यवान पूर्ण, 
ओद, तुम्दांर पत्र ने आनन्द की सनसनी सुसामे 


पत्र मंजूषा. ४६ 


करदी । पेसा मालूस पड़ा,, अथवा यह सत्य था कि हमारे 
राम की पवित्र चेतना इस 'चिद्ठी और मेरी आत्मा में व्याप्त 
थी । निस्सन्द्ह .यह आअव सत्य है, क्योंकि डसके पत्रों मे 
से एक में मुझे सूचित किया गया था" माता, राम सदा 
सुम्दारे साथ है,” ओर आत्मा के लिये कोई द्ृद्वन्दी नहीं 
है। ऐसा ही में विश्वाल करती हूँ। हां, निश्चय रखती हूँ 
कि राम #पूर्ण के साथ है । आज का दिन कैसा पवित्र और 
शान्तिमय रहा है जो तुम्दारे पत्र म॑ महान्‌ चेतना को ला 
रहा है | इस पत्र के खाथ साथ तुम निवेदन करते हो, कि में 
उन पन्नों के सम्नह को, जो राम ने घुझे भेजे थे, भेजू। 
उनकी कहावतों ओर कृतियां की भी कुछ याददाएत॑े 
६ भेज दूँ) । हम में-खे सत्र से श॒ुद्र के लिये भी सदा 
प्रेमपूर्ण रखने वाला भावात्मक ध्यान | यह मसद्दान्‌ श्रवुद्ध 
आत्मा बच्चे की सी सोम्यता से हमारे मनों ओर हृदयों को 
हमारे परमेश्वर, अपनी देवी आत्म से मिलाने को ऊंपर 
उठा ले गया। अरे, आधुनिक ऋषि राम के द्वारा आविभूते 
होने वाली उस महान चेतना की मछुरता ओर कीमतता की 
बलिद्दारी | परमेश्वर हमारे साथ था, पर हम में से कुछ 
यह नहीं जानते थे, ओर अब भी परमात्मा हमारे साथ है, 
और जैसा कि कण्याणात्मा राम ने प्रायः कद्दा था, “स॒ृत्यु हे 
डी नहीं,” वह” ( परमात्मा ) उन से दूर नहीं जिनके नेतच 
देखने को ओर कान छुनने को ह। १६०३ साल का ठीक 
आरखस्म था, जब में पहले पहल इस महात्मा से मिलनी थी। 
चह सेन-फ्रांसिस्को में व्याख्यान दे रद्दा था। में वे मन उस 
का व्याण्यान छुनने गंद थी | किन्तु उस के ७० उच्चारण से 
-मैरा मन ऊपर को उठ गया, मेरी हस्ती ऐसी खुशी से" 





# सरदार पृणार्तेंद्द से मुराद है। 


घर स्वामी रामतीथे. 


कि 


फड़क उठी जैसी कि पहले कभी में ने अचुभव नहीं की थी। 
स्वर्गीय, कल्याणकारी शान्ति ने छुके जममगा दिया। 
और जीवन की रोटी जो वद्द बड़ी स्वच्छेदता से देता 
था पुष्टि पाने फो में दूसरा झवसर कभी नहीं चुकी, अर्थात्‌ 
धराणाद्ाार रूपी व्याख्यान को सुनने सेफिर'मैं न चूकी। उसने 
अमेरिकर्नों स यद भी अपील की कि भारत वर्ष ज्ञाकर मेरे 
देशवालियों के परिवारों भें विल्षकुल उन्हीं फे से होऋर रहो 
ओर छन की सहायता करो । अनेक लोगों ने जाने का वचन 
दिया | किन्तु गया उन में से एक भी नहीं । एक दिन में ने 
राम से कद्दा, “स्वामी ! आपने मेरे लिये जो कुछ किया दे, 
उख्र के यदल्षे में में आप के ज्ञाति भाधयों के लिये फ्या कर 
सकती हूँ !” उन्द्दो ने कद्दा, “अगर, तुम चाहो तो चुत 
कुछ कर सकती हो, किन्तु भारंत चषे को जाओ। ” मेने 
उत्तर दिया, “में जाऊँगी ।” किन्तु मित्रों ने छुके रोका 
ओर उपहास तक किया। कुछ ने कद्दा कि जाने का विचार 
करना मेरा पागलपन है, विशेषतः चूंकि भेरे पास लोटने 
को काफा रुपया नहां था, 'केन्तु राम ने कहा, “यदि तुम 
बस्ठुतः चेदान्त जानती होती तो तुम कभी न डरती, फर्योफकि 
भारत वर्ष मे तुम ऐसा ही परमेश्वर पाओगी जेसा अमे- 
रिका मं।” बेसे ही प्राणों के दिव्य बेतन्य स्थरूप परमेश्वर 
मे, मेरे प्यारे: हिन्दू भाइयों ओर बहनों, हां, मेरे वच्यों की 
प्रेममयी, आर फोमल उत्कंठा के छारा, अपनी सर्वपालक 
शक्ति प्रमाणित कर दी | फिर भी पांच महीने दीत जाने पर, 
अपने कल्याण स्वरूप राम से किये एुएं अपने वादे फो में 
पूरा फर सकी ओर उस के स्वदेश के लिये गने प्रस्थान कर 
दिया । अकेली ! उस खु में एक भी मजुप्य को 
नथय जानती थी, तथापि राम की शिक्षा के अजुखार पूर्ण 


अधक 


पत्न मंजूषा. ५44 


पिश्वासके साथ “ अनन्त की पालक सुजा का सहारा” था। 
मेरी अन्तिम सेंट राम से शारुता रिंप्रस्स, केलिफेनिया में 
इुई थी। खन-फ्रांसिस्फो के लिये मरी गाड़ी छुटने के पूर्व 
केवल चन्द्‌ घंटे में वद्दां ठद्दरी थी। में उस पह्दाढ़ पर का 
चद्द दिन कभी भूल नहीं सकती, हिमाउछादित शाएताशबड्ड 
मीनार की तरह हमोरे सिर पर देडायमान थी। ढाई वर्ष 
बाद, जब में अमेरिका लोटने वालो थी, इस, महात्मा रेत 
मिलने के लिये कई दिन तक हिमालय का सफर करके में 
व्यास मुनि के स्थान गई। मन को दिला देने वाले उस 
अन्तिम झसिवादन का वरणुन करना या लिखना असस्मव 
है। और /अन्तिम, कुछ ही महीनों बाद इस मद्दापुरुष ने 
शरीर त्याग किया । 

भारत वर्ष के लिये रवाना छोनेके पूर्व छुझे कल्याण स्वरूप 
राम की, ज्ञो कुछ दिनो तक शास्ता में रह थे, कई चिटद्ठियाँ 
मिली थीं। वे लिखते हे +--- 


शास्ता स्ंप्रिग्स, केलीफोर्निया, 
८ अकतू दर, १६०३ |; 


अत्यन्त कल्याण रुदरूप दिव्य माता, 


शाम आप की द्रंक प्रगाद का पूरा क़द् करता ह। 


४५ ु 
' रास इतना स्वाथा नहीं ६ (के आर का आर समके, न इस 


की कोई सम्पावना हे कि राम फभी उसे भूल जाय जो 
अपने भारत के, सत्य फे, ओर पीड़ित मानव जाति के प्र 
मे राम रूप दो गई थी। सूर्य का अर्थ हे खनन! ( अग्नेज्ञी 
शब्द सूर्ये का पर्यायचाची )। ( उस ने मेरा नाप खुयोनन्‍्द 
रक्‍खा था और चेसा ही रास छद्दता हे।) “असत्‌ का 


श्र स्वामी रामताीर्थ: 


प्रतिरोध न करो ” इस का अथे लिष्क्रिय नास्तदित्य हो 
जाना नहीं है| नहीं, विलकुल नहीं। इस वचन का- शरीर 
के कार्यों से कोई सम्बन्ध ही नहीं हे | इस आदेश .का 
सम्पक मन से, ओर केचल मन से हे। यह वाक्य मन की 
शान्ति का उपदेश देता दे । मानसिक प्रतिरेध, विरोध 
ओर विप्लच “संवारने के” बदले सदा विषमता, व्यग्नता 
ओर खीम पैदा करते है, और फलतः तुम्दे अस्थिर करके 
प्रतीत द्ोने वाली चुराई फो प्रेम से ( बलिदान, या दानशील * 
अकृतिसे)जिससे बढ़कर कोई उच्चंतर शक्ति नहीं हे,जीतते हैं । 


“घुंराई का प्रतिरोध न करो?” ओर घटनाओं का स्वागत 
, एक दाता की सी प्रसन्‍नता से करो। भहान्‌ आत्माएँ अपनी; 
सभ्यता कभी नहीं नष्ट होने देती। अपनी शान्ति क्ायम 
रखने से हम बाधक ढेला था रोड़ो को सदा सीढ़ी के 
पत्थरों ( ओरटो ) में बदल सकते हैं । निराशा की भावना: 
को तुम्हें फदापि, कदापि अपने मन में न आने 
देना चाहिये। - 
ठोक, इसो समय रास को चियार आया था कि “भारतं- 
वर्ष पहुंचने पर सुझे अपने सुभीते के अचुसार तुरन्त 
प्यार पूरन का पता दयोफ्त करना चाहिये ” । बद्द पंजाब 
मे कहीं द्वोगा। “थंडरिंग डान” का सम्पादक” चहीं हे। 
उसक लिये परिचायद् पत्रों (7000८०07ए ]९6०7:9) बह 
ज़रूरत नहीं है। ह 
आशा है कि एक स्थान ( सीट ) ठीक कर ठेने के वाद 
तुम तुरन्त राम को पत्न लिखागी। ै मे 
तुम्द्ारा अपनादही विशुद्ध चीर आत्मा 
राम स्वामी के रूप में । 


पन्न मंजूषा- श्र 


के 


यद्द चिट्ठी ( राम से ) मुझे तब लिखी गई थी जबकि 
अपनी जितत भारतीय यात्रा के संबंध में मेरे मन पर 
बढ़ा भार था, क्योंकि मेरे काने का बड़ा विरोध 
हवा रद्दा था। 


32 | ४४ !] ४ |! 


शास्ता स्प्रिग्स, फेलीफ़ोर्निया, 

हे १० अक्तूबर, १६०३, 
व्यारी माता, 

लिखने के कागज़ और ल्िफार्फों सहित तुम्दारा प्यारा 
'पन्न मित्रा | मेने उसे एक पेटी कागज़ झोर लिफाफे भेजे । 
अजब तुम उस सहानुभूतिशील भूमि ( भारत ) पर क़दम 
रकखोगी, तब तुम्हारा हार्दिक स्वागत किया जायगा। 
राम सारत को खिख चुका है। यदि तुम वहां जाओगी ते 
अपने नाम को अपने आपसे आंगे दोड़ते देखोगी। जहाँ 
कहीं तुम डिकना चाहोगी, वर्दी तुम्हारा रुवागत दोगा। 
(पक प्रश्न के छत्तर में चद्द कहता है)। जब हम अपने 
आपको ओलछिेपन, तुच्छृता भोर दास विलास फे दाल 
कर देते हैं, तब प्रकृति के एक अदृश्य फानूनस से हमें उस 
की प्रतिक्रिया ले ऐसा दुःख भोगना पड़ता है कि जो हमे 
आीले दवा देता है। बुद्धिमान मलुष्य खंदा अपने मन फो 
स्वेस्थ रखता है और एक मात्र परम तत्व में रूगाये 
रहता है। 
5 जद्दां तक सांसारिक बातो का संबंध दे, वह अति 
उदार राजकीय दाता फी सी तटस्थ, डदासान, निष्काम और 
जैययुक्क द्क्ति से उन में लगता है । 


क् 


४ स्वामी रामतठीर्थ- 


यद्द श्र".्ठट भाव समस्त क्रियाशीज कार्यो में क्ायम 
रक्‍खा जाता हे। ओर लिष्किय अलुभवों के संबंध में, 
मुक्त-आत्मा उन सच को अ्प्रभाचित, अविचलित भाव से 
ओर बड़ी इंसी खुशी ले भोगता है, अथवा हर समय" 
अपने इस स्वासाविक प्रसाप को स्पष्ट रूपसे याद्‌ रखता 
हूं. “भें अकेत्ा हू, अद्वितीय हूं, सूय मेरी सूत्ति 
( चिल्द ) है । अपने आपके वास्तविक सूर्य>घरित्र फो 
निरन्तर मनन करने से ओर ज्ञीवन के नित्य के मामलों मे 
उसके प्रयोग से आप का व्यक्तिगत आत्मा प्रेम, प्रकाश, 
आर प्राण को उच्चतम दिभूति होज्ञाता छें। आशा दे कि 
जहाज़ पए चढ़ने या जद्दाज् चलने के पहले तुम राम को | 
लिखागा। जब झाप हांगकांग झोर ज्ञापान पहुचोगी तव 
भी आप को लिखना चाहिये। भारत में तुम्दारे लिये 
कुछ ( खुसाता ) करने मे राम को बड़ी खुशी होगी । 


तुम्हारा अछ, प्रेमी आत्मा 
राम के रूप मे । 
३० | ३४ [| ७० !!! 
शास्ता स्ंप्रग्स, फेलीफोर्निया, 
१६ अक्तूबर, १६०३, 
अत्यन्त घन्‍्य ओर अ्रष्ट सूथ्यानन्‍द, 


ठ॒म्हारी दोनों चिद्चियां आज दोपहर को एक साथ ही 
राम के द्वाथ भें आई।सव ठीक और सन्तोंपजनफ है | 
चूंकि तुम लम्बा सफर करने वाली दो, इस लिये यदि : 
मानवप्रकृति का तुम्हारा ज्ञान कुछ ओर चढ़ ज्ञाय, तथा 
पूर्ण रूप से स्थिरचिस, शान्त और खदा अपने घर में रहने 
की महत्ता तुम्दोरे हृदय पर अमिट रुप से अक्वित दो ज्ञाय, 


पत्र मंजुषा, ५४ 


वो तुम्हारा उपकार हो सकता है। ( एक मामले में देर. 
प्री जिससे मुझे; बड़ी वेचेनी थी )। सब वाह्य विल्म्बो 
ओर विरोधों का अभ्षीष्ठ तुम्हारी आल्तरिक शक्ति 
ओर पवित्रता को बढ़ाना है। प्रकृतिवादियों ने निर्विचाद 
राति पर सिद्ध कर दिया हे कवि विरोध भओर युद्ध वा कलह 
के बिना किसी तरह का विक्तास या उन्नति असस्भव दे। 

तुम्हें राष्ट बल ओर मकड़ी की कहानी याद है? 
“क्या सैकड़ों, नहीं नहीं, हज़ारों असफल प्रयत्न प्रत्येक 
महान्‌ आविष्कार के पूर्वगामी नहीं होते हैं ?” खूब रूबेरे 
यदि आध घंटा यह मन्त्र जपने में तुम लगाओगी तो अच्छा 
करोगी ( मन्त्र न देने के ।लये क्षमा करिये ) | इस मन्त्र को 
जपते खमय इस में निहित सत्य को अपनी प्रकृति में 
प्रवल्लता से भरते रहो । इस प्रकार की निरन्तर आत्म- 
सूचना तुम्दे पूरा संभ्यासी ( स्वामी ) बना देगी। कृपया 
शीघ्र लिखना क तुम्हारी यात्रा के सम्बन्ध में क्या वन्दो- 


बस्त हुआ । गस्सारतम अस आर अत्यन्त खच्चछ आदर 


हिककेत 


के सहित । 
तुम्दार निजात्मा 


हि राम स्वामी । 
॥ % ॥| 
शास्ता स्प्रिग्स, फेलीफोर्निया, 
२१ अक्तूबर, १६०३। 
अत्यन्त धन्य ओर रिव्य खूथ्योनन्द, 
तुम्हारा कलह का पत्र अभी मिला । 


झोद्द ! केसा सुखकर सम्बाद दे,भारत के किये प्रस्थान । 
हांगकांग में याद आप सेठ चास्सिया मल आसुमल ( घंटाघर 


अ्द्‌ स्वामी रामतीथ्थ-. 


कक की 


के निकट ) से मिलेगी तो हिन्दू व्यापारियों को राम (तीर्थ) 
की झानन्दायस्था और अपने श्रष्ठ उद्देश्य का समाचार दे 
कर आप उन्हें प्रसन्‍त कर सकीगी। 

जिन लोगों को चिट्ठियां दी जा चुकी है वे सब स्थानीय 
मामलों के सम्बन्ध में तुन्हें संतोषज्ञनक्क समाचार स्तर 
खुबोध कर देंगे। तुम्दे केचल चल पड़ने की ज्रूपत दें, 
बाद को अन्य धरेफ बात यथेए्ठ स्निग्घता से. चलेगी । एक 
बात ध्यान मे रखना। जब किसी धअम्प्रदाय के लोगों से 
: मिलने का तुम्दे इक्तिफाक दो, तब दूसरे दा की ज्ञो समा- 
लोचना वे करें छस पर तआ॥आप कदापि नहीं, कदापि नहीं, 
कदापि नहीं ध्यान दे, इस का खयाल रक़्खें, या इसे याद 
रक्‍खे | यदि कही भी आप फो भाक्ते, अल्लोकिक प्रेम, दान- 
शीलता, या शझात्पिक ज्ञास की पृक्ति दिखाई पड़े, तो उसे 
ठुम ग्रहण करो, सोफ़ सो, अपना निजांग रुप बना लो, ओर 
किसी व्यक्ति के छेष को अहण करने का समय न पाओ। 
उन की डुर्वेलताओं ओर चुटियोँ पर ध्यान न दो । 

कलकत्ते मं सठ सीताराम को मिलने से न भूलना। 
कलकत्ते भ तुम ( मासिक पन्न ) “डान” क्षे विद्वान सम्पादक 
से भी मिल सफती हो, जो निरासिमानी, विशुद्ध, आत्मत्यागी, 
भ्रद्धालु ओर फट्टर वेदान्ती पुरुष &ै।थे एक शिक्षा ओर 
छात्राचास संस्था भी सफलता-पूर्वक चला रहे हैं । कलकत्ते 
में तुम संकीतेन, भाक्ति पूर्ण नृत्य का भी खुखोपभाग कर 
खकती हो। 

भारत माता सदा तुम्हें उसी तरद्द ग्रद्ृण फरेगी जिस 
तरद्द एक्न भेममयी माता वर्षो के बिछुड़े दच्चे को लोटने पर 
अहण करती है| चतंभान के लिये भगवान तुम्हारा फल्‍्याण 
फरे। राम सदा तुम्दारे साथ है। 


पन्न मंजूषा, ५७ 


॥7858926 0 ॥780॥& ! 
0! श6 ढक एथ्थां; 70 ॥07267! 
9600 $8/76 879, 0 50प ! 
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भारत की यात्रा । 
अरे ! अब हम नहीं रुक सकते ! 

हम भी जदज़ पर सवार होते है, पे आत्मा ! 

तेरे लिये, हम भी पथद्दीन समुद्र मे नाव छोड़ते हैं ! 

निर्सेय होकर अज्ञात तथे के लिये ! 

अत्यानन्द की तदरा पर। 

समुद्र यात्रा करने को दम भी तेयार दोते है। बहा ले 
जाने वाली हवा के वीच स्वच्छन्द्ता से आतनम्द के गीत 
गान अधात भ्रगवत्‌ अजन करते ओर छुलखमय शान्ति कर 
35 का उच्चारण करते हुए हम भी चलने को तेयार हैं, 

ऐ भारत यात्रा | 

इन समुद्री में यात्रा करते या पद्दाड़ो पर चलते, अथवा 

रात मे जागते हुए, 


६० 


स्वामी रामतीथे. 


घिचार--फाल, देश और मझत्यु के मोन विचार--जलवत्‌ 
बहते हुए, 
चस्तुतः मुझे मानों अनस्त प्रदेशों के मध्य मे सेले 
जाते हैं । 
जिन की यायु में सांस लेता हैं, जिस की तरंग “7 * *« 


७००७०००७५ ४५६७७७०७ +७०+०७८ कक) ०५० ०+-० ०»००००० ००० ००० ७७ ०७. १७७ ००७ ०» ००० +क्क 


ऐ परमेश्वर ! मुझे अपने में नहत्ता, तेरी ओर-चढ़ते हुप, 

में ओर मेरी आत्मा तेरी पंक्ति में श्रमणु करें 

ऐ भारत माता की यात्रा ! 

आगे को काल गिनते हुए ऐ आत्मा, जब समय रूप तू 

प्राप्त हो गया, 

सब सागर पार कर लिये, मंझटों को सम्द्दाल लिया, 

यात्रा पूर्ण हो गई, 

आत्मसभर्पण किया, अब परमेश्वर ऋूगड़ता हे, 

सामना करता है ओर अधीन होता हे, लद्॒प प्राप्त 
हो गया । 

मानों परिपूर्ण मित्रता से, पूर्ण प्रेम से, 

बड़ा साई मिल गया, 

छोटा उस के अक म स्नेह से पिघला जाता है | 

पे सारत यात्रा | 

फ्या इतनी दुर की उड़ान के लिये वच्तुतः पंख संघ 

शुप हे ? 

ऐ आत्मा, क्या सचमुच तू ऐसी याज्रा्शों की यात्रा 

करती हे 

क्या नीच (इस लोक में ) तू संसक्तत और वचेदों की 

ध्वनि करती है ? 


पत्र मंजूषा . ६१ 


तब थे अपनी निलेज्ज़ लग्न सू प्राप्त कर । 

ऐ वृद्ध भयानक पट्देलियों ! तुम्हारी ओर, तेरे तदथं! की 
ओर यात्रा दो ! 

दे गलाघुटती समस्याओं ! तुम्द्वारी ओर यात्रा, तुम्हारे 
स्वामित्व की ओ र यात्रा हो ! 

भारत माता की यात्रा हो ! 

दे पृथिवी ओर आकाश का रहरुूय ! 

ऐ समुद्र के अल ! 

ऐ चकक्‍करदार द्रारे ओर गंगा तुम्हारा रहरूय ! 
तुम्हारा (रहस्य) ऐे बनो ओर खेतो ! तुम्हारा रहस्य, 
ऐ शक्चिशाली हिमालय, हं 

ऐ मेघों ! ऐ वृष्टि ! ओर हिमो ! लाल प्रसात का रहरुप, 
ऐ दिन ओर रात, तुम्हारी यात्रा हो | 

ऐ खूये और चन्द्र, और सब तुम नक्षत्रों, तुम्हारी 
यात्रा हो, 

नक्षत्ना. बुध ओर द्ुहस्पति, तुम्दारी यात्रा हो ! 

यात्रा तुरन्त यात्रा ! 

मेरी नाड़ियो में रक्त जलता हे ! 

पे आत्मा, तुरन्त ल्ेंगर उठाओ, रास्स्षियां काट दो, 
खींच थो, दरेक वादवान दिला दो ) 
'भूमि मे चुक्चों की भांति क्‍या दम काफी देर तक यहां 
खड़े नहीं रहे ! 

खा, केवल गहरे जल ( समुद्र ) के लिये खेओ, 
क्योंकि हम चह्दां जाने वाले हैं जहां अब तक किसी 
मटलाद ने जाने की हिस्मत नहीं को हे, ल्‍ 
ओर हम जद्दाज़ को, अपने आप को, और सब कुछ को 
जोखिम में डालगे। 


श्र स्वामी रामतीथे- 


मेरे बीर आत्मा ! 
पिता, ऐ पिता ! खओ । 
साइसा किन्तु छुराक्षित आनन्द, 


पिता, पिता ! 


अपने सच्चे घर को खेओ । 


रे #! २7 


शाम 
3४ | 3०2 )।! ७७ [|]! 
डे 
५ शिकागो, इल्लीनोइस | 
१५ फरवरी १६०४ 
अ्रत्यन्त धन्य आत्मा 


आप के अनेक पत्र, तार,, ओर सथ कुछ ठीक समय 
पर राम को मिले। जब केवल एक ही तत्त्व हे, तो कोन 
किस को धन्यवाद देगा १ राम एपं से परिपूर्ण हे, राम सर्वे 
आनन्द हे। राम सव्वेद पूर्ण शान्ति है । कार्य राम ले बद्दता 
है । राम काई काम नहीं करता है। तू स्वर सुगन्घित 
गुलाब हो, ओर मधुर ग्रध आप ही चहढुुूँ ओर त॒ुक से; 
सुझ से,ओ सुझ से, वद्देगी । 

- क्या तुम अपने आप को पूर्ण हृदय ले हिन्दू समझती 
हो? क्या उनकी भूलो ओर अन्ध विश्वासों को आप 
अपना सममकतती हो ? अपने निन्नी भाइयों ओरपबहनों के 
समान क्‍या आप उनपर भरोसा कर सक्तती -हो ? कया आप 
कभी अपनी अमेरिका की पेदायश भूली ओर जन्म के हिन्दू 
में अपने को रूपान्तीरत पाया ? जैसा कि रास प्रायः अपने 
आप को गददरा रंगा कट्टर इंसाई देखता हे । थदि ऐसा हे 
ते। अनायास अद्भुत कार्य तुम से निकलेगा । 


पन्न मंजूषा. द्व्३ 

तुम कीन हो ? तुम कोन हो जो पतितों का उद्धार करते 

को दोड़ती फिरती हो ? क्या सुवय॑ तुम्हारा उद्धार हो गया ? 
क्या तुम जानती हो कि * जो कोह अपने प्राण बचावेगा, 

वह उन्हें खोघेगा ?” तो कया तुम भर्ठों (श्रष्ठों) मं से एक 
हो ? क्या तुम भी एक च्युत ( भ्रष्ट ) हा सकती हो या होना 
चाहोगी ? तब उठो और च्राता बनो | पापी दनो-डससे अपनी 
बकता का अद्धभव करो, और तब तुम उस का उद्धार 
कर सकती दो | केवल एकमात्र प्रेम-सा्ग से अतिरिक्त और 

कोई रास्ता सब पर विज्ञय पाने का नहीं है । 
छ# 85 | 
तुम्दारा अपना शआत्मा 
स्वामी राम के रूप मे 
35 | 
मिल्तियापोलिस, एम, एन. अमेरिका 
है. यह ३ अप्रेज्ञ १६०४, 
अत्यन्त कल्याण/त्मा, 

तुम कहां. दो ? मथुरा के लिखे शुभ नये वर्ष के पत्न के 

चाद प्रिय भ्रष्ट माता की कोई चिट्ठी नहीं मिली । शास्ति, 

_ शान्ति, शान्ति भीतर से आती है । स्वर्ग का साम्रांज्य 
केवल भीतर है। पुस्तकों, देवालयों, देवस्थानों, मद्दात्माओं, 
आर साधचुआ मे आनन्द का खोज व्यर्थ है। तुम्दारं अनुभव 
ने अब तक तुम पर यद्द ज़रूर प्रकट कर दिया होगा। यदि 
यह पाठ एक बार पढ़ लिया गया तो सूल्य कुछ सी देना 
पड़े, पर वहः महँगा किसी दामों नहीं दोगा । अकेले बेठो, 
अपनी पीड़ा वा आकुलता को दि्वय आनन्द में परिणत कर 
दो। “थैडरिंग डाद ” खरीखी पुस्तकों से उत्साह पद . 


द्छ स्वामी रामतायरथ 


खचनाएँ श्राप को भाप्त दो सकतीं हैं। ३४ का चेन्तन 
(ध्यान) करो ! ओर मानवजाति निमित्त शान्तिके दाता बना 
न कि एक आशाशल अन्चेषक | प्यारी | “शास्तास्पग्स 
में फ्रीक (076९६) के पास राम ने जे अन्तिम शिक्षा 
तुम्हें दी थी, क्या वह तुम्हे याद हें ? चद्द शिक्ता मंगता का 
दशा स नहीं दी गई थी, वल्कि प्रकाश ओर प्रेम के (नेत्य 
दाता की छेसियत से दी गई थी, जब दमारा मंगने का साव 
होता है,वब हमारे हृदय फर जाते दे। अमेरिकर्नों के प्रति 
राम की अपील में सारत की जो दशा वयान को गई हे वहद्द 
तुम ने तसदीक कर ली होगी। दया करके उस व्याख्यान का 
पक वार फिर पढ़ लिना | अपने निष्काम भ्रम स किसी तात्का- 
लिक, प्रत्यक्ष फल की आशा न करना। इईंसा की आत्मा 
कद्दती है, “सेचासे सन्तुए्ट रदो !”” सवाके अधिकार से बढ़कर 
कोई पुरस्कार,आशीबोद या ४नाम नहीं है । यदि लखनऊ के 
“ऐडचोकेट” के सम्पादक वाबू गंगाप्रखाद वर्मा खे आप नहीं 
मिली हैं तो कृपया डसे ज़रूरामेलिये ।सारत के ग़राब 
हिन्दुओं के कशास साथ खेंने से आाप के हृदयको क्या अधिक 
खुख प्राप्त होता है या अमेरिका म॑ जीवन के, खुखों को 
गने में १ ( यहां तक कि ) में फर भारतवर्ष मे उत्पन्त 
द्वोना चाहता हैं । 


हत 


32 | 35 !! ७४ !!! 


राम एक मद्दीने तक पोर्टलेंड ( ओरीगन ) में, एक 
भदहीने डेनवर मे, दो सप्ताह शिकागों में, ओर दो सप्ताह 
- भीनियायेलिस में था। इन स्थानों में चेदान्त समा सग- 
ठित हैं । विभिन्‍न पिश्वविद्यालयों में निःशुल्क दातबृतियां 
गरीब दिदन विद्यार्थियों के लिये प्राप्त की गई हैं। यहां से 


पत्र मजूषा, - ६५ 
राम बफैले, ( न्‍यो याके ) को जञायगा । चहां ले चोस्टन, 
निडयाक, फिल्लाडलाॉकफ्रिया और वर्शिगटन डी, सी. को 
ज्ञायगा | पद्दिली मार्च और २६वच ३० जून को सटलूईस में 
चल्डेस यूनिटी लीग ( संसार्भर के मित्राप की संस्था) 
के अधिवेशनों में राम को उपस्थित होना होगा। जुलाई में 
राम लेक जनवा में होगा। दूसरे शरत्काल् में राम लंदन, 
इंग्लैंड जञायगा। प्यारी माता | साहल न छोड़ी । घस्तुओं 
के केवल उज्ज्वल पक्ष (07870 806) की ओर देखो। 
विना कांटे के एक भी गशुत्ाव नहीं है, इस अमिश्चित 
संसार में पुएय कहां ! रपुय स्वरूप तो केवल परमात्मा हे। 
यदि भारत में अमली चेदान्त (सत्य) होता तो अमेरिका 
से ऋपीक्ष करने की कया ज़रूरत पड़ती १ जुच तुम्हारा 
हृदय सर्च की सुन्दरता से पूरी तरह एफ्वस्वर हो जायगा, 
तब तु मको सब ऋद्दी हरेक व्रस्तु महेज्ज्वल मालुम पड़ेगी। 
शान्ति) | शान्तिः !! शान्ति: !!! 

केन्द्रीय आनन्द, आन्तारेक हुए, सदा ओर सबेदा 
के लिये ( तुम्होरे साथ द्वो )॥ 


तुम्दाारा अपना आत्मा 
स्वामी राम के रूप में 


32 | 3४ |! ३० !!] 
चिलियम्स बे, विस, या लेक जेनेवा, 
८ जुलाई १६०४, 
अत्यन्त कल्याण कप दि्व्य आत्मा, 
' तुस्दारे पत्र राम को मिले | धन्यवाद | राम स्थिति फो 
पूरी २ तरह समझता. है। शान्ति, आनन्द और सफल्तता 


द्द स्वामी रामतीथ- 


संदा तेरे साथ स्देंगी। अधिकार जमाने फी सावना और अभि- 
लापा- जिस पवित्र आत्माने दूर कर दी उसके लियेः काई 
भय, खंतरा या क्किली प्रकार की कठियता नहीं दे। में- 
विश्व में अपने को पसारता हूँ ओर स्वच्छुन्द हुआ आराम 
करता हूँ । छाती में भुन्नग यह परिव्छिन्त “मैं” ही है। उसे 
निक्राल कर फेंक दो, ओर खारा खंखार तुम्दह(र| सत्कार- 
करेगा । मिनियापोलिस से “राम” के लौटने पर एक 
लम्बा टाइप किया हुआ पत्र “प्रैशटिकल विज्ञडम 
( मालिक पत्र ) में प्रकाशनाथ श्राप को सेन्ना गया था।- 
पत्र का विपय था “व्यवहार में लाने योग्य वा व्यवद्वार सिद्ध 
शान ”। खेद लुश्स में वल्डख यूनिटी लीग की प्रथम बेठक 
“राम? की अध्यक्षताम असरस्प्र हुए । यू नियी लीगमे राम के व्या- 
ख्यानों के साथ २ कुछ अन्य स्थानों के अतिरिक्त सं लुएश्स 
में स्थापित थियासोफिकल सोसाइटी ओर चर्च आफ प्रेक्न- 
टिकल क्रिश्चियेनियी के आश्रमों के तले भी. प्रवचन-इुए थे । 
कुछ दिनों में राम शिकागों जायगा,वहां से बफेलो, लिलीडेल 
झोर ग्रीनएकर (मेन ) जायगा, ओर सितम्बर में या 
पहले दी अमेरिकों से रवाना दोजायगा। खबको शाए्ति 
कल्याण ओर प्रेम पहुँचे | 
तुम्हारा अपना आत्मा 
स्वामी राम के रुप में 
3 । 3०४ !! 35 !!! 
जैकसनपित्ले. फलेोरिडा, 
४ १ अक्तूबर १६०४, 
अत्यन्त कल्यालस्व॒रूप प्रिपात्मा, | 
राम ने कुछ दिनों से तुम्द कुछ सी नहीं। लिख है । 

इसका कारण यह है -- 


पत्न मेजूपा- ६७ 


(१) राम निरन्तर घुइत मलरूफ ( कार्यब्यञ्न ) रहा, 

(२) समाचार पत्रों के लिये कुछ पत्नों के सिवाय भारत 
मे किसी व्याक्ति को पत्र नहीं लिखे गये, 

(8) यह जान कर कि तुम अच्छे हाथों में ( सज्ननों के 
 यास) हो, राम ने पत्र भेजना आवश्यक नहीं समझा, 

(४) जब से मिन्नियापोकिस छोड़ा, तब से राम को 
तुम्दारी काई चिट्ठी नहीं मिली । 

: शान्ति कल्याण, प्रेम तथा झानन्द खदा और सर्चेदा 

मुम्दारे साथ रहे । | 

स्वयं अपनी भीतर की आवाज़ ( नाद ) का ठीक २ 
अचुगमन करने में तुम किसी के अ्रति कूूठे नहीं होसकते 
हो | हमने किखी का भी कुछ देना नहीं है । हमारा परिश्रम 
प्रेम का परिश्रम ६ निष्काम ) दोना चाहिये। खदा गम्भीर 
ओर सम्पन्न होना हमारा नियम वा सिद्धान्त होना चाहिये। 


हरेक नर ओर नारी को स्वच्छन्द्ता से अपना अपना 
अज्ञभव करने दो | इमे केवल यही अधिकार हे कि अपने 
साथी मनुष्यों को उनकी श्रश्नसर ग्रति में सहायता दे । 
जब में मित्रों का उनके आध्यात्मिक पतन में सहायता देता 
हूँ, तव उनके साथ में स्वयं गिरता हूँ। तुम कुछ भी करो, 
कहीं भी तुम दो, राम का आशीर्बाद ओर प्रेम तुम्दारे . 
' साथ है। परसा “शाम” नियुयाक के लिये रवाना होगा। 
चहुत सम्भव हे कि ८ अक्तूवबर को (शाम) प्रिसेद्ध 
आईरीन ( 2777088 47676 ) नामक बह्द्दाज़ पर सचार 
होकर जिन्नालठटर जायगा । सम्सवतः भारत पहुँचने में 
कुछ समय लगे, क्योंकि राह में अनेक स्थानों में ठद्वस्ने 
की संसावना हे ! 


द््द स्वामी रामतीथे- 


याद रखने ओर अमल करने के खूज्ः- 
० 70 5 कं । कट.» कल. ७ 
, यदि किसी मिन्न के किसी दोप की आप जानते दी तो उसे 





भुला दो । 

यदि उसकी कोई अच्छी बात जानते हो तो वह फह दो। . 

“बह परमेश्वर खब लोगोके हृदयोंमे ऊँचे पर मिराजमान 

है और वह भी जो कि हम खोगो में दोष प्रतीत होगा । 

उस का चेद्दरा अत्युतम रखायन की तरह नका आर 
योग्यता भें चदल जायगा | उस चविभेय निरन्तर दाता को 
खूयेबत्‌ इति, जो (बृत्ति) बिना किसी पुरछछार की आशा के. 
सेवा करती है, जो विष्नरहित प्रेम से प्रकाश झीर जीवन 
का भसार करती है, , ईश्वर फे तेज की तरद्द विव्य प्रथा 
में निवास करती है, जो व्यक्तित्व की सम्पूर्ण सांचनों से घेर 
है, ओर स्वार्थ परता से मुक्त है, वद्दी छुक्कि ओर उच्छार हें । 

४ | ९४॥ 07 6 68ए6४।ए 708779, 

4 ैएंमोर 07 6 ॥९8१९70ए ज्ञग॥6, 

(0०00 8 जोंग 70 870प7त 776, 

283]] 2000 48 407 6४७० 7776.7? 


“पं स्वर्गीय बंशलोचन खाता हूँ, 

में स्वर्गीय मद्रि पान करता हूँ, 

परमेश्वर मेरे भीतर ओर इदेगिद है, 

साथ भलाई सदा के लिये मेरी है।”! 

तुम्हारा अपना आत्मा 
'. स्ब्ामी राम 

( मिलिज़ वेटमेन अर्थात्‌ सूर्याननंद्‌ का राम के खत के 

उत्तर में नीचे लिखा पत्र बिना तारीख का है। 


पन्न मेजूषा. ६६ 


“झोह, एन झसूल्य चिट्वियों के पढ़ने मे क्या लुत्फ़ है ! ओर . 
इनकी नक़ज्ल करना झाधिक प्रछकाश,इणपे, पवित्र ओर बढ़ा चढ़ा 
अलुभव प्रदान करता है | प्यारे पूरन ! में जानती हूँ, इन से 
सुस्दें आनस्व्‌ मिल्लेगा, ओर फिर जिन्हे तुम-ये देशोंगे उन 
खब को ये झट्ठायता पहुँचावे णे । पूरी नक़ल्न देना तो 
अखम्भव है। दल्याण स्पेरुप दिव्य गुरुदेच का (४778 ),ओजस 
(तेश) काग्रज़ और शुरुदेद की स्लिखी सब पंक्वियों में व्याप्त 
'दहै। मेरे लिये सब से भ्रधिक सूल्यवान यही हैं । स्वयं राम 
दी मेरे निकट उपस्थित द्वो. ज्ञात ६. जब में उन सात्विक्त 
पंक्किया को पढ़ती हूं, जो मेरे हृदय मे प्रेरणा उत्पन्त कर 
देती हैं, हां मेरे मच और हृदय को प्रकाशित करती हैं, यहां 
' तक कि आत्मा फी उध्यवक्तता दिखाई देने लगती है, और 
'मेरी आत्मा, घास्तनिफ दिव्यात्मा एक मात्र तत्त्व मुक्े 
भान दोती है | 

सूय्योननद्‌ । 


2... १८) $ 
१ न 


निम्न लिखित पन्न उक्क सय्योनन्‍द्‌ को राम के अमेरिका 

से भारत पहुँने पर लिया गया था। 
हुए !.  . हे! हर्ष ! 
के 3£ | छ | 8० .[ 
ः बम्बर | 

अत्यन्त धन्य'रूप प्रिय माता, 

राम बस्वई में पांच दिन ले है ओर शीघ्र मथुरा पहुँ- 
खेगा। व्याख्यानों और क्ोगों सल- मिलने जुलने मे राम सदा 
अति प्रवृत्त रहता है | राम सदा की भांति अत्यस्त प्रखलन्‍न 


० स्वामी रामतीर्थ- 


है। आप श्रसी तक भारत में दें यद छुन कर 'राम! को बड़ी 
खुशी हुई । इश्वर तुम्दे पूर्ण स्वस्थता, हृदय में शान्ति, 
प्रफुल्लित घृत्ति, और आनन्द्मय चित्त प्रदान करे। तुम रेत 
भधरा भें मिलने की में श्राशा करता हैं। 
आप का 
आत्मा में रहने वाला 
स्वामी रामतीर्थ ... 
६: $ रात 
38% ! 
आनन्द !। आनन्द | आनन्द | : 
प्यारे पूरन, तुम जानते हो कि हम सब मथुरा मे करे 
मिल्रे! ओर तुम सभाओं का दाल भी जानते हो। फेस 
घनन्‍्य समय चद्द था । 


चस्य !। चन्य ! 
35 ! 82 | 8» | 
पुष्कर, - 
१४ फरवरी १६०४ । 


अत्यन्त धन्य रूप प्रिय दिव्य माता, 


वम्बर विए्वविद्यालय के एक्र डपाधिधारें ( भी. ए. 
उत्तीर्ण विद्यार्थी ), एक छुन्दर युवा पुरुष ने आज्ञ राम के 
कार्य में अपना जीवन अपैण किया है। वह राम के साथ 
रह कर साहित्य के काये भ॑ सद्दायता दिया करेगा। प्यारा 
परमेश्वर या विधाता कितना भत्ता है। जो उस पर भरोसा 
करके काम करते हैं उन को घद्द कभी धोखा नहीं देता है । 


नारायण स्वामी शीघ्र विदेशों में व्याख्यान देने -को सेजे 
जायेगे । चेचेकृस्थाना ओर दिशास्तरों का काम भी उत्तनः 


.पत्न मज्जूषा- ३।ु 


ही मद्दान दे जितना उज्ज्वक्तें केन्द्र का। रहट में दांतः-के 
'सबद्श;छोटी लकड़ी का सहारा (हिन्दुस्तानी मे जैसे कुत्ता 
'कद्दते हैं ) भी-उतनाद्दी महत्वपूर्ण है;जितना 'कि-बेक ।.यदि्‌ 
'छुद्र शकड़ी का सद्दारा दृदा लिया जाय तो फिर .खारा. यन्त्र 
नहीं,टिक सकता । नहीं, नहीं, सक्र में सगी हुई हरेक कील 
अत्यन्त मदत्वपूर्ण है। यदि देखने में पेखी छोटी- थीज्ञो का 
बच्चे उपयोग नहीं करते हैं तो क्या हुआ । इंश्वर की दृष्टि मे 
छोटा से छोटा कारये भी, प्रेम वृतक्ति ख् किया जाने पर, बहुत 
बड़ा है | नन्‍्द्दा सा ओसकण प्रभापूर्ण सये के सामने कुछ 
भी नहीं जान पड़ता है, किन्तु विचारवान्‌ फी दृष्टि देखती 
है कि वही नन्‍्हा बूँद समस्त खूयमण्डल को अपने मधुर 
छोटे हृदय में प्रतिविम्वित करता-दे | इस किये, .मेरी धन्य 
प्यारी माता, व्पेज्षित स्थानों में कोमल, मौन कार्य, ,जिस में 
नाम और कीतें नहीं है, उतना ही भ्रष्ट ओर अत्यावश्यक 
है जितना कि खूब शोरणुल् का काम जो सम्पूणे मानवजाति 
का ध्यान आकार्षेत करता है। भें जो थोड़ा काम करता 
जन पड़ता था उस से में निराश हुआ था । “वे भी सेचा 
करते हे ज्ञो केवल खड़े होकर प्रतीक्षा करते ईैं.।” माता 
, नन्हे बच्चे को तपेटती है, ओर उस का समय जब उसे 
विश्वविद्यालय में ल्ञाता है, तब अध्यापक सयाने झड़के को 
पढ़ाता है, माता का काये उतना उच्च ओर कीर्तिकर 
हीं हे जितना कि अध्यापक का | तथापि माता का कठैव्य - 
अध्यापक से क्दी अधिक मधुर और महत्वपूर्ण हे। हम 
. यहं नहीं सद्द सकते कि बचपन में माता की ग्रोद ओर 
सुलाने की थपथपाहट का स्थान अध्यापक का कमरा ओर 


शेक्ता भद्दण कर ले। ध है 
वेदान्त चाहता हैफि साधारण कुत्ती अपने दीन वा छोटे 


छ२ स्वामी रामतीथे- 


से परिश्रमको ठीक छृष्ण या ईसा का सा महत्वपूर्ण और पवित्र 
परिभ्रम समझे। कुर्छीफा एक पाया जब दम इटाते हैं,तव क्‍या 
दम सारी कुर्सी नद्दीं हटाते दे !इसी तरह ज़व हम पएक्क चित्त 
को उठाते या ऊँचा फरते हैं, तब हम उस के द्वारा सम्पूर्ण 
संसार फो एठाते और छत्कए्ट करते हैं, मनुष्य क्री घनता 
(50॥0%777) इतनी कठोर है । 


८४ झपने आप रे परिमित, और परमेश्वर फे अन्य कार्य 
की दशा से निश्चिन्त (थें परघाह) अपनी सम्पूर्ण शक्ति अपने 
ही कायों में ढालने पाले सज्जन तुम देखते हो ऐसे महान 
जीवन प्राप्त फरते हैँ । 


ऐ पधन-ज्ञात वाणी ! बहुत काल से अत्यन्त स्पष्ट, 
तेरी सी एक चीख अबने ही हृदय में में खुनता हूँ । 
निश्चय फरो अपने आप में स्थित होने का, और जानो 
के जो अपने झञप को पाता है घह अपने दर्भाग्य को 
खोता है । 
3७ ! 
हप | हुए | ४» | शान्ति, कल्याण ! प्रेम ! 


$ (2 ६ ०००० _-पट 





राम 
पुष्कर, (जिला अज्ञमर ) | 
५ २ फरघरी १६०४, 
३० | शान्ति, कल्याण !. प्रेम ! दृर्ष ! 
अत्यन्त धन्य स्वरूप द्व्प माता, 


तुम्हारा मधुर, स्वर्गीय पत्र प्राप्त छुआ । शरीर पर ऐसा 
जुन्द्र कावू होना जसा कि कल्याण रूप खूथ्यनिन्‍्द्‌क। दे, 


पत्र मज्जूषा ७३ 
चास्तव भे परमेश्बर से विचित्र स्थरेक्य ( एक स्वरता ) हे, 
ओर प्रेम से अर्भुत तालेक्य ( एक तालंता ) है। ( में बीमार 
था, ओर दिव्य शक्ति से चंगा छुआ हूँ, । प्रेम ) 

36 ) ज्ञय ) जय | जय ! 
- तुम ने जो कविता भेज्ञी थी बह अत्युत्कष्ट थी। 
(00 ४0788 7 & 7ए8६8770प७ णश्ए 
पा फ्णावेश8 0 ए9९४०0777! 


6 खोधा8 पांड 40080998  #6 80& 
जैआत 75१68 पू०00 #6 80777. 


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(27 ॥#6ए९० शिया हाथ), 

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3९6 46६07 8क्का8, 776€8॥ 00प्रा'8४० ६७7०. 
पृफण6 ठ0प्रद5 ए8 80 प्रएली कल्प... 

- 84'8 78 जाए ग्राह0ए बात 29/ 0768८ 
गग्र फीढ8शांग्र्ट ४00 ए0०प7 68. 


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पृपा6 9प्रव 7789 ॥8ए8 8 97687 (886 
छा 8ज़8 6६ जी] 96 ६6 40ए07, 


परमेश्वर गूह्य ढ़ से चलता है 


छछ3' स्वामी -स्वातीथे, 


अपने अज्भुत कार्य करने को ! 
3 


चह सागर से अपने पग जमाता है 
अप 
झोर तूफान पर सवार द्ोता है । 


कभी न चूकने घाली दच्तता की, 

अथाद गइरी खानो में । 

अपने ढज्ज्वल मनसूबों को वद संचित करता,दे . 
ओर अपने सब श्रेष्ठ लंकल्प को कायोन्वित करता हे, 


तुम सयभीत सन्‍्तों ( साधुओं ) | नया सादर्स पकड़ो' 
जिन भेघों से तुम इतना डरते हो। 

वे दयासे बड़े है और तुम्हारे सिर पर 

आशीर्वाद में ह॒टेगे ( चर्षेगे) 


घूरने चाली विधि के पीछे 

इश्वर अपना हँसता चेद्दरा 'छिपाता है । 
कली में चाहे कडुआ स्वाद हो, 

परन्‍्ठु पुष्प मधुर दोगा । 


दां, वावू ज्योतिष स्वरूप वास्तव में भलाई के अत्यन्त 
धन्य, स्वगीय अवतार हैं । वे बड़े ही कृपालु हैं। 


तुम्हारा अपना आत्मा , 
स्थामी रामतीर्थ के रूप में 


पतन्न सञ्जूपा. जब 


पुष्कर, (जिखा अज्ञमेर) 
3० | हृषे ! दृ्ष | ४४ ! शान्ति ! 
-धन्य देवी माता, 
-. राम उस छत पर लेटा था जिस पर आप उसके साथ 
बैठी थीं। - 
« (किशनगढ़ के प्रधानमंत्री की उदारता-पूर्ण कूपालुता के 
द्वारा मुझे घुवारक राम के साथ पुष्कर में एक .दिन व्यतीत 
“करने की आज्ञा मिल गई थी .। ) 
में द्व्यश्ञान में डबचा इचा था, और तब तक बेखबर 
था जब तक तुम्द्दारा पत्र कुछ ओर पत्रों के साथ राम के 
हाथों में लाकर रकणख्ता गया था। चिट्ठी खोलने के पहले 
तक लम्बी, हार्दिक, पुरज़ोर और झुखपूर्ण हँसी तुम्हारी 
अन्यात्मा को भेज्ञी शई थी। ३४ ! शान्ति ! शान्ति | शान्ति ! 
प्रियतम , माता, तुम्दारा मधुर पत्र पढ़ने के वाद राम तुम्हें 
इर्षपूणे हँसी की दूसरी मद्दाध्वनि (गरगराहट) भेजता है । 
माता, दर प्रकारस तुम बिलकुल ठीक हो, और राम 
तुम्हारी पवित्र, मधुर, कोमल, ओर खोम्य प्रकृति को खूब 
समभता है। राम विभिन्‍न विषयों पर लिख रहा है--गद्य 
और कुछ कविता-परमेश्वर के आदेश के अश्चुसार | 


बावू भ्रंगाप्रसाइ वमों लखनऊ तथा अन्‍य स्थानों में 
तुरन्त स्प्री-शिक्ता का छखुधार करने के उद्देश्य से कन्या 
पाठशालाओं को देखने के किये ओर स्प्री-शित्ता-पद्धति का 
अचलोकन करने के लिये विदेशों को भारत के अमध्य प्रार््तों 
में जाने चाले थे। यद्द कारये. प्रान्तिक सरकार ने डनके 
सिपुदे “किया हे !:इस कारण मार्च से पहले वे सम को 
देखने नहीं आखके । रास सम्सवतः गर्मी में मेदानों 


७६ स्वामी रामतीथ्थे. 


33 जे 


में न रहेगा । राम को कश्मीर से प्रेम है. ओर 
तुम्दारा तथा राथ सवानीदास और अन्य मित्रों की 
संगति से उसकी बढ़ा स्वाद -आधिंगा। राम की ४प्रस्थिति 
और घातौलाप ले अगशणित चुचधित आत्माओं फो लाभ 
होगा, यदि राम तुम्होर साथ कश्मीर जा सका। किंतु 
दिव्य माता, सब से वड़ा विशेषाधिकार जिसका ममुष्य 
उपभोग फ़र सकता है, वह है हृदय, मन, शरीर ओर 
सर्व॑स्ध का निरन्तर सत्य ओर मनुष्यता की वेदी पर 
जलना है, और यद्द मार्ग भीतर की भावमयी, पिशुद्ध, धीमी, 
नीरघ वाणी के रूप में परमात्मा को स्वीकार है | 

“यदि फष्सैव्य पीतल की दीवारों को 

बुल्ाता वा पुकारता है ( दीघारं से सिर टकराने क्रो 

फद्दता हैं), 

तो फोन सूख ऐसा पतित दोगा जो द्िचकेगा ।”? 

माता ! समर्पित जीवन का पथप्रद्शन प्रायः केएई गुद्य 
दिव्य चिच्छक्कि फरती हे, जिसका विश्लेषण नहीं 
किया जा सकता । 

राम तुम्हारे साथ कश्मीर शायद्‌ जाय किन्तु चलेन 
के ठीक समय तक निश्चयपूर्वक कुछ नहीं फटद्ठा ज्ञा खकता | 

तुम्हारा अपना आत्मा, 
राम तीर्थ । 


35 | 32 )! ४5 !!) 


_सलगानाओ, 





जयपुर, 
ु ६ माचे १६०५। 
उत्यन्त धन्य प्रियतम भगवति, 


पत्र मेजूषा, - ७3 


रास के आते के संबंध से तुम्हारी भविष्यद्धाणी यहां 
तक सत्य उतरी है कि-राम पुष्कर से चल दिया है। यहां 
ले वह किघर जायगा, इसे वह समय आने पर परम 
विधाता ( रुय्यों के सूय्य ) के हाथ मे निशशुय के लिये 
छोड़ता द्वीे । दा व्याज्यान अज्ञमेर टाउन हात्र से दिये गये 
थे। लोग जयपुर के टाइन हाल में व्याख्यानों का भ्वन्ध 
करन वाले हैँ | पूरन पुष्कर गया थां, ओर दो या तौन 
दिन तक राम के साथ पहाड़ों पर घूमा। द्ल्िजेगसिद्द 
बड़ा ही सुशील हे।भ्रुंड के कुंड लोग राम को देखने 
आते है ओर इसका अस्त होना चाहिये। परसेश्वर ओर में ! 

आज सांरे दिन हम साथ जाँयग, खद। प्रेम पिया 
रात को हम साथ सेविंग ओर सवेरे ठठेंगे तथा जहां कहीं 
पग लेज्ञयेंग वहाँ जोयगे, एकान्त स्थानों में या भीड़ से, 
सब ठीक ही होगा । हम यात्रा का अन्त करने की इच्छा 
न करेंगे, न विचार करेंगे कि परिणाम क्या होगा | कया 
सब बातों का अन्त अभी से हमारे साथ नहीं है ? 

382 | 835 !| 85 !!] 

राम शीघ्र ही चिट्टियों की पहुँच के परे जंगलों में, 
पहाड़ो में, परमेश्वर में, तुम में होगा। न मालूम कब फिर 
तुम्हे पत्र मिले । ः | 

तुम्हारा निजात्मा 


राम 
शान्ति, कल्याण, प्रम सदा तुम्हारे साथ रहे । 





धर स्वामी रामतीर्थ, 


385 | 3० |) ३० !]! 
+ हरद्दार। _ 
. सायकल, ग़ुरुवाए। 
अत्यन्त धन्य प्रिय म्उ्ता, ;ल्‍ 5 


आपकी भविष्यद्धाणी ठीक उतरी ओर रामादिददरा तथा 
अपनी देची .माता की ओर श्रा रहा है | केन्तु लोगा ने 
अत्यन्त प्रेम के कारण राह में कई स्थानों पर राम को 
रोक लिया है । अलवर, मुरादाबाद, अज्ञमेर झोर जयपुर 
में व्याख्यान दिये गये है| अपने प्रिय घनन्‍य बाबू ज्योतिस्वरूप 
का रेल मे संग छोड़ कर, राम हरिद्वार स रुका है। यहां के 
सोय को राम की उपस्थिति का पता खथ गया है और 
वे बड़े प्रेम से शाम स अधिक काल तक ठद्दरने की 
प्राथना करते हैं । राम भी यद उचित नहीं समझता कि 
जो युवा साधु था अन्य लोग राम ले बहे उपदिशा के भूख 
या बिलक्षण रुप से पात्र हैं, उनकी दशा को छुधारने के लिये 
उत्पन्त किसी भी जवान साधुओं तथा जो, कुछ किया ज्ञा 
सकता दें उसे करने का यह मौफा सो दिया जाय | जब 
मथुरा में हम मिले थे, सब भाता, तुमने रास से साधुओं में 
ही काम करने को कहा था। बड़े प्रेम से साछुगण शम के 
उपदेश अरहण कर रहे हैं | 


गंगा के उस तट पर चंडी के मल्दिर पर राम आज 
चढ़ा था । एक्र मनोद्दर छोटी सी पहाड़ी की चोटी पर 
मंदिर स्थित है । और दृश्य अत्यन्त सोहावना | दजनों 
शाखाओं में टती, ओर लोढती हुई गगा का दृश्य बढ़ा दी 
छुम्दर है । चडी मन्दिर से हिमालय के हिमखड(8!800878) 
सोत या हीरे के से दिखाई पड़ते हैं । 


पन्न मंजूषा. ७६ 

“368860 (06, 

उक्ष67 ए7क्वांड88 707' 9]8776, 

जशांधाश' 7एॉंशा08 707' 4068, 

पिशणिक्ष' [078, 707 ॥8/760, 
- वैशंप्राह' 0047, प्र07 व एशं६४098, 

परशं६067 70776, 707 80728 ]870 

नैप0] 00708 07 8 एछ0०व उ8 ग)0र्षव्रए 

ध0०6 48! 000 48 76६7, (४0व 48 ४96 ०गर ए९७।ए, 


आ धन्य स्वरूप, 


न स्तुति न निन्‍्दा, . 
न मिन्न न शत्रु, 
ने प्रेम, नद्धेघ, 
न देंह, न उसके सम्बन्ध, 
न घर, न विदेश, 
' नहीं | इस दुनिया की कोई भी वस्तु महत्वपूर्ण नहीं है। 


परमेश्वर है ! परमेश्वर सत्य हैं, परमेश्वर एक मार 
सत्व वस्तु हे । 


हरेक चीज़ को जाने दो। परमेश्वर, परमेश्वर केवल 
सब में सब है। अमर शांति चृष्टिवुन्दों के सम|न गिरती है। 
चुष्टिवुन्दों मे अछुत घिरता है । राम का मन शाहत्ति से परि- 
पूरे है। दृषे मुझ से बहता है।  - 


राम सुखी है, ओर तुम सदा खुखी दो तुम्द शान्ति ! 
ल्याण ! प्रेम ! हर्ष ! हर्ष | ७० ! ३४ ! ४० पहुंचे ! 


घ्० स्वामी रामतीथे- 


तुम्दारे विद्यार्थियों की, मेज़बान ओर उनको पत्नी 
( बाबू ओर अ्रीमती ज्योति स्वरूप ) को प्रम, आशीवाद, 
हपे पहुँचे । ) 
तुम्हारा अपना आत्मा, 
ह राम ! 


४ जुलाई १६०४ 

खत्पन्त धन्य प्रिय आत्मा, 

लगभग एक सप्ताह पूर्व तुम्दारे मेसरी के पते ले भेजा 
हुआ राम का पत्र आप श्रीमती को इलसे पर्व पहुँच गया 
होगा । अयकी गर्मी में राम काश्मीर नहीं जा सकता | अतः 
कैलाश, मान खरोबर, तथा अन्य स्थानों की अपनी सेर का 
उपयोग तुम वड़े खुभीते ले कर सकती हो। झुखी अमे- 
रिका में व्यतीत होने बाले पहले के जीधन के दृश्यो की 
याद दिलाने चाले भूमभागों को झुन्दर पद्दाड़ी दृश्यों मे दस्त 
कर निश्चय तुम्हे घर का अनुभव होगा । 


रि78 75 ए९७7'ए ॥७]0709 ! 

गज ॥6 गी0005 07 ॥76, 70 76 56077 07 06४०७ 
पर 270 00छ7 4 79, 

ांपरा०० 870 (॥0767 एं०६४९, 

आएगा णींडी 60 879४6, 

87 ९70॥655 एछशी, 

4 ९॥६70£2772 8568, 

0/ 80ण778 १/6, 

आए 47 8 छह 007 0०7 ॥76, 

7 वीडए ज6४प्गह ६6 गए78 7008 ० 000- 


पत्र मच्जूपा ; घ्ब्१्‌ 


राम बड़ा प्रसन्‍न हे ! 
जीवन की बह्दियाश्रों मे, कायों के तृफान में 
ऊपर ओर नीचे में उड़ता हूँ, 
यहां ओर वहां; 
जन्म से सृत्यु तक, 
एक अनन्‍्तद्वीन जाला, 
ओर ददीप्यमान जीवन का, 
एक परिवतेन शील सागर में बीनता हूँ! | 
इस तरह समय की सीटी वबजाते हुए करघे मं, 
में देवता की असली पोशाक को । 
बीनता हु प्रा उड़ता हूँ ! 
35 ! 
तुम्हारा अपना आत्मा 
राम, 
85 ! 
१० अगस्त १६०५ 
ल्याण ! प्रेम ! द॒षे ! 
शान्ति |! शान्ति ! हे 
अत्यन्त कल्याणमयी प्रिय माता, के 
कुछ दिन बीते, तुम्हारी चिट्ठी मिली थी। किन्तु हाल में 
राम ने किसी चिट्ठी का जाबब नहीं दिया है । आज तीन 
अति उपयोगी- पुस्तक समाप्त हुई हैं, जिन्हे राम भाषा में 
जनता के लिये लिख रहा था । अब तुम्हारा -स्वास्थ्य 
कसा दें राम तुम्हारे पूण स्वास्थ्य ओर बल का 


ह# 


धआराभलाषा हे । 


० स्वामी रामतीशे. 


35 | ३४ |] ७४ |!!! 
अमेरिका को तुम्ठारी यात्रा का प्रवन्ध करना तनिकर भी 


कठिन कलाम नहीं हे, किन्तु हम लोग चाहते हैं कि तुम हम 
जोगो के साथ रहो। शायद यह स्वार्थपूर्णता है, किन्तु आप 
भी तो यहां के लोगों को प्यार करती हैं। क्या आप को यदद 
निश्चय हे कि शरीर *ी डुर्बलता का कारण केचल भारतीय 
जल्वायु है, ओर अमेरिका लौट जाने स आप को अवश्य 
लाभ होगा ? यदि ऐसा है, तो हम मे से किसी को भी आप 
की यहां रखते की ज़िद न करना चाहिये | आप के कुशल- 


पूर्वक केलीफेर्निया पहुँचने में हम सव को सहायक 
होना चाहिये | 


[कप 
न्द्द 


शान्ति ! 
बज 
आशा हू ये 


>>, 


हार्दिक आशोर्वाद | प्रेप्त ! 
जि 


यि पत्र आप को स्वस्थ पावेगा । 
35 ! 
राम! 
3» | 3४ [| ४० |! 


' शान्ति | कल्याण ! प्रेम |! दृष ! हु ! 

अत्यन्तं कल्याणमयी प्रिय भगवति, 

शायद तुम्हे पहले ही। से मालूम दो कि राम पहाड़ में 
मसूरी ले लगभग एक हज़ार मील दूर दे । बंगाल के जंगली 
मभेहकर्म के अधिकारियों के एक पुराने मकान में एम बिल - 
कुल अकेला रहता हे । यह स्थान रेल लाइन से दूर, 
डाकूघर से हटा हुआ, आगन्तुकों ओर मिलने चलो की 
पहुँच जे परे, डुनियां के एक अत्यन्त मनोहर दृश्य से घिरा 
हुआ है| इस के थोड़ी ही दूरि पर खुन्दर झरने ओर चश्मे 


पत्र मंजूषा परे 


बह रहे हैं, ओर जब वर्धा-बादख नहीं दोता, तब छुनिया का 
5 रे चली. ह ४ 
सर्वोच्च पहाड़ पोरीशंकर ()४४ २7७४४) दुर पर दिखाई 
पड़ता-है | यहां भी बनवासी पहाड़ी लाग राम के लिये दाज़ा 
34 ८ ५३ किम्ष 
दुध लाते हैं| बच मे विचरने ओर अध्ययन करने में राम 
का समय वीतता है । 


जब “मनुष्य वन म॑ परसेश्वर स मेल्ष सकता हे, 
यह नाम, यश, आकांत्षाएं, दाोंलत, कृतकायंता ओर सबस्च 
केस काम का ? “कुछ करने के चुखार ' का हस क्यों श्रद्दण 
करे ओर पोषण करें? 


हमें दिव्य स्वरूप हाने दो | प्रातःकालीन परत चल्नती 
है ओर उसे यह चिन्ता नहीं होती कि कितने, ओर किस 
प्रकार के, फूल खिले है । वह केचल दरेक वस्तु पर चलती 
है, ओर जो कलिंयां खिलने को बिल्लकुल तेयार है, वे अपनी 
आँखे खोल दती हैं | शरों की कंदरे, जल्तत हुए बन, मेले- 
कुचल फारागार, भूकम्प के धक्के, गिरती चद्धाने, तूफान, 
समरभूमियां और मुख पसाएे हुई क़॒त्रें, यदि दम मे ईश्वर- 
भाषना साथ २ लावे, तो वे इस तडेंक भड़क, सस्मान, 
माहिमा, सिहासनोा, बिलासी परिज्नन समूह (7'6४776) 
ओर अन्य समस्त वस्तुओं से कहीं अधिक मधुर हैं, कि 
जिनसे युक्त मलुष्य स्वय आसन्तरिक एकानत मे भातर हृदय में 
अद्देत से एक नहीं हे । 


. ओह ! कृतकार्य की खुशी, प्रत्येक पय को अपना 
उद्देश्य बा लक्ष्य बनाने वाले हलके २ कद्म, प्रत्येक रात 
शारीरिक झत्यु ओर प्रत्यक दिवल हमारा नवर्जादन 
( नित्यं हो, नित्य हो ) | । 


प््ठ स्वामी रामतीर्थ. 


8४९, #ए४९१प४, 800 ]087, 
प्रणा४ ग्राद्चा।एंणा प्रतीए8०5४ 48 600 8778॥]. 
4 &0प0 79 0ए6 ७0786 ए।!] 989, (0॥ | 
पफ6 4078 णी 8एा।रंआह 02867! 
प08०॥९/३8 १0. 776 [09 ० डेज़ाशा]08 
05880 ए९॥ +एस्‍प्रष्ठ 88 ६986 00९87) ! 
309 । ४० । 
अल्तिम नमस्कार, मित्रो ! 
ओर हम अलग होते हें, 
मरे लिये विश्व-मदत्त चहुत छोटा है । 


४ 


में ओर मेरा प्यारा अकेले खलंगे, ओह ! 
थझो साथ तेरने के मज़े ! 
साथ ! नहीं, नहीं, तेराकों की खुशी 
समुद्र की तरह लद॒खते हुए घुल गई ! 
हे | हफपे) 
82, 
चुम्द्रास अपना आत्मा 
35 | 
निम्न लिखित भी एक ( कविता का ) भाग हे ओर 
अभी मुझे मिला हे। : - 
$5()70! २7४०४! ?९३०४! 28296! एघए! प्रगपरणंणहु 
श86७॥ ॥0 0806 धीए 07685 47 ४6 7707पाह 
780,77 
४688 वृ0पराप्र९ए8 हंड एव, शैेहा 6ए७ णा 8 छिपा 
ा0०णट्ठा। पि6 ॥९8ए९शए 8048068 70 वध: 
या 2ट्य०९४, 07 5प्रग6४७ 5जद्गी0 प्रदत-। श0्088४॥8.77 


एः 


पत्र सञ्जुषा- 0] 


अल 68 ग्रण, ०प्राऋव्जाए (पृष्शे 8, 07 
507एष"777,77 

480 ४00, 807 0 ९७70, ए0 ॥88 70708, 808, 206 
9९, ह9 इधर 0तकदें,?? 


& 08 ॥॥6 80 0॥ ह6 877 77 006 एच प्ांहाँ 
8.8 8 ए078 7शी९९६ 77 ६08 8९६ 

50 छगबा 0 पाए ए0ात९7 558श॥8 ए४6४६ 

[8 9ए 8 7एशी९९व००फ 00 7॥6, 

27990 &] 778 46 एए छ8गीपे ए७ए९ए्//, 

23] 27'8706प्र5 7ए ९87४ ए0ए7)0 ९७॥8$४7786, 

ऊ3ए ९७०70 07 6 86806 (8 6 ॥697"60॥, 

47684 9ए 407' 6ए९७॥" ज़876 77786. 

2] 87'2प्र7९एॉ8 789 +छ।ं), 

ै]7] 407779] ९7"९९१४ [070ए6 :9]56, 

(09ए 86 ॥79978 80 7९९९६ ॥.0220*8 ७"प/ए68 

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ये स्वामी रामतीथे. 


व्‌ 0ए8 [96 छावी। ध्ते ॥९6 व& पक्षाए व6 8 एथ7४ 
07 ॥6. 

जजए तर 72987 48 8/807658 एछगरंआ ॥ 076, 
एछ॥ाए छा0पणोंते ॥ ऋब्बोए8 8788 707 ॥87 47070 
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ए५७॥० 38 97५ 78. ”? 

“ श्रा | शान्त | शाह्त | ऐ शिष्य | छठों । 
प्रातःकालीन लालिमा भें अपनी छाती निमज्जित करने 
को झकदटान्त जल्दी ऋरो ?। 

“जैसे यह पुृथिबी सूये पर अपनी आँख लगाये, 
आकाशी स्थानों में होती छुई ओर नीजलिमा में आरक्त, 
या सर्येहीय तूफानों मे निगली छुई यात्रा करती हे ” । 

“ठ5हरती नहीं है, समाव रूप से सूर्य से प्रछाशित या 

य्‌ 


तूफान खरे अस्त छुई यात्रा करती दे ?। 
बल ही तू, हे एथिवी के पुत्र, जिसमे शक्ति, 
4 


लक्ष्य और समय है, ' अब भी आगे ज्ञा 

जेख सूर्य का प्रकाश वर्षा के कोहरे मे, 

जैसे नक्षत्र सागर में प्रतिविस्वित होते हैं; 

वैसे दी जो सेर आश्चय को विराटतम प्रतीत होत। है, 
मेरी केवल्न एक प्रतिच्छाया है। 

ओर सब वस्ठुएँ जिनका आदर मेरी आत्मा करती है, 
सब विभूतियां जिन को मेरा हृदय अपनावेगा, 

जो मौनता छुनती दे उसक्नी आश्वासे, 

जो पहले दी स सद्दा के लिये मरी थीं । 

सब बहसे वेकाम हो सकती हैं, 


प्रश्न संजूपा. न 


सब नाम मात्र मत मिथ्या साबित होते हैं, 
केवल शिथिल् चित्त को तक के आधार की ज़रूरत 


मनुष्य के हृदय में प्रकति ओर परमेश्वर एव हैं | 
करूं ! ज़त्र कि संव चीज़े दूर 


वल्ल मेरी आध्यात्मिक अत्यन्त अर वश्यक्ताशओ। को 
पूरा करता ह€ | - 
ये, अपनी कृतज्षता, अपना प्रेम लाता हूँ। 
ये ओर निघ्ड़कफ हुआ प्रवेश करता हूँ । 
अपने आपको प्रत्यक्ष छ्ेपप्य विचार से स्चच्छ 
फरता हूँ। 
निक श्रम को स्घुति का रुतोन्न बनाता हूँ। 
 पृथिवी को प्यार करता हूं, ओर उल्चके निञज्र-जीवन 
हि ही को अपना अश समभता हूँ। 
मेरी एक. माज्न प्रार्थना प्रसत्तता हे, जिसे में प्यार 
करता हूँ, 
किसी दूरस्थ दारेण से में सहायता की विनत॑ फयों करूँ? 
जब कि प्राण मेरा दे, जब कि में “उससे” एक हैँ 
जो मेरा प्राण है ।”? 


/ 2 


57 
44560 


32 | ७० |. ४० !]| 
आप स्वयं 
राम । 


दप स्वामी रामतीर्थ- 


प्यारे पूरन, रे 

इन सुल्यवान सिट्टियों म॑ साग लेने से में प्रसन्‍त हू। 
दम दोनों राम के शिष्य थे। ऐ भारत - माता ! मेरा हृदय 
तेरी ओर उछल्वता है । प्यारे बच्चो ! सुथ्यानन्द्‌ को स्मरण 
करने में न भूलना । | 

तुम्हारे आधुनिक ऋषि (राम ) का विद्यार्थी सदा: 
सपदा तुम्दारा ध्यान रखता है। झूत्यु के इस शरीर से, 
गड़बड़ की इस नगरी ( वेबीलन ).स जाग कर दम वॉहिर 
आना चाहिये। जरामरण के अच्चुसव से धनवान होकर 
हमे अपने पिता के घर लोटने दो । “ ॥,6६ 676 0680 [02४ 
०0०५ 48 06७0 ?, “मृतक अतीत को अपना मुद्दों तोपने 
दो ॥” स्तक चंतेमान को अपना खसुदों गराड़त रहने दो । 
जो वाणी दम मे बोल रही दे, उसकी हम खुनेंगे, ओर 
परमेश्वर के लिये फ्रेपंगे नहीं । हम अपने आप फो उसी 
एक नाम खे पुकारंगे, क्योंकि हमारा जन्म लिक्नदीन ईश्वर 
सेहुआ हे ओर “में हूँ” में अमेंद ह। । 

तू ईश्वर परमात्मा का शब्द हे ओर तू नित्य हे | सारा 
जीवन अव्यक्त है । सा 

“केंचल चढद्री घाणी अनबन्तता को जान सझकते दे जा 
व्यक्तित्व को देखना छोड़ चुके हे ।” संकीर्रोाचित्त लोग पूछते 
हैं, “क्या यह हमारी जाति का है ? किन्तु द्विज ( सत्य से 
उत्पन्त ) लोग श्रेष्ठ स्वभाव के होते हैं। ( उनको ) सम्पूर्ण 
संसार फेवल्ल एक परिवार हे” (गाीवा ) | 

प्रकाश ओर प्रेम एक हैं। तू स्वतः प्रकाश स्वरुप है । 

#“ल्वफएढव हॉवाए'छती 8779, ऐप 770ए6 00ए९0'6७गा 

था शांत, ?? 


पन्न मंजूषा. ६ 


“द्वेष कलह: को भड़काता है किन्तु 
प्रेम सब पापा को ढक लेता है |” 


मनुष्य का हृदय अपनी राह ( पर चलना ) चांदता है । 
' किन्तु धभु ढसके क़दमों को सड्चालित करता है । 


४ स्मृत्ति के काराज़ात, यय्पि दुःखद परन्तु मधुर, अपना 
अभाव कसी नहीं खो सकते ! ” 
: प्यारे पूरन ! मेरी इच्छा दे कि ज्ञिख २ लेख के प्रकाशन 
करने. की तुम्दारी अमिलाशा द्ो,इलस छब के छपवाने के लिये 
में इसी के लाथ २ रुपया भेज सकूँ | 


में भरोसा करती हूं, प्यारे प्रन | कि तुम इसका उत्तर 
चैना स्थागित न करोगे, क्योकि मुझे इसकी पहुँच की सूचना 
की ज़रूरत हैं । 


तुम्हारी माता और तुम्हारी पत्नी को प्यार, ओर जो २ 
मुझे| पूछे उन्हें कृपया मेरी ओर से भी पूँछ देना। बा० ज्योति 
स्वरूप से जय उत्तर मिल्ला था तब से उन को में दो चिद्ठियां 
लिख चुकी हूँ | स्वामी शिवगणाचार्य का क्या हुआ ? कृपया 
साचित कीजिये यदि अभी तक भी वे मथुरा में ही दो £ यदि 
प्रिय राम के परिजनों से तुम्दारी भेंट हो, या उन्हें प्रेम-सन्देश 
भेज सकते हो, तो ऐसा कर देना। तुम जानते हो कि सत्य, 
प्रेम, ज्ञान के साम्रज्य में हम पक्ष हैं. ! ४० | 3० | ३० | 


भवदाय- सदा खदा का माता । 


पता-स्टेशन एम. लोस-ऐड्जलिस फैलीफोर्निया 
सूर्यानन्द । 


स्वामी रामतीर्थ. 
७0037, सा 
6). 
(0०0 ॥)९85 007" 870607४ ति90, 
70७7६ 770, ०0॥66 207008 प3706, 
फएफणफ 58887 48]&7त 60 406 70, 
झऋफ0क्ा) 777 40 02.06 ए०709%9, 
हए 9०४९० 96908 6!0' एशं87॥ 067श॥. 
(00 9]658 ०0० 9९४९४४पो 400, 
(2) 
7,6६ 8] |67' 8078 १7 4006 पा 6' 
खत .्रक्कर७ गीशा 00 गाशंए तैपाए वश, 
का कीशा ए्ंगी ।ता0फ8098 ४७ए७/ ६706 
ते 6६ धाशं7 ५१70096 8776 076 ए. 
ह (3) 
०्फ' ढ4 6 0०प707ए 000 77797076, 
छए6 ॥67 ७ 687772, 00, 0706 7007'6, 
नप079 छ॥7/ स॥ ॥67७ ८0 9०प7, 
्पिराशाते ॥60 478 700९ $076 ६0 807'6 
(306 790688 0706 79०एश९ पे पितृ व, 
(4) 
(0 878 07 फ्रांट/ए 06७९४ प्रत00, 
() रि8709 ९१७० 80 77876 270 70]6, 
07896 ॥07 706 ॥॥ €एा। 0895, 
एजएछ0एगए ह0एष्ठी 0 एध्याएं ३५४8; 
(0०6 9658 ०५० ॥९७658 सिए्तत, 
पिला 9 4,076: 


पत्र मेजूषा, ६१ 


राष्ट्रीय गीत । 


इंश्वर कल्याण करे हमारे धाचीन हिन्द का; 
प्राचीन हिन्द, एक समय के प्रतापी द्विन्द, का 
सागर द्वीप से सिच तक, 
काइमीर से कन्या कुमारी तक, 
सदा पूर्ण शान्ति भारत से विराज। 
इृएथर कट्याण करे दमारे शान्तिमय हिन्द का । 
२ 
उसके सब बच्चे प्रमसत्र में गुन्द ज्ञाये । 
,और अपने कर्तव्य का पालन दीक ठीक करें | 
है परमात्मा | नित्य सत्य ज्ञाव से तू उन्हें पारेपूणं कर। 
आओर उनके सदूर्गुण फिर ले चमक | 
डे . 
तुम्हारी सहायता की प्राथना देश करता है, 
ओह, एक वार दे प्रभु ! उसकी फिर खुन ले/५ 
राष्ट्रीय साव उसमें भर दो, 
उसकी कीर्ति द्वीप छीपों में फेला दो, . - 
कभी के शक्तिशाली हिन्द को सगवान कल्याण क्रे 
छ 
अकथित शोय्येपूर्ण कायों के कत्तों, ऐ कृष्ण ! 
नित्य महावीर और साहसी ऐ राम ! 
चुरे दिनों में उनका साथ न छोड़ो, 
यद्यपि वे अनेक प्रकार से अयोग्य हैं, 
इंश्वर कल्याण करें हमोरे निसखद्दाय हिन्द की। 
राम का प्रेमी । 


डर स्वामी रामतीर्थ. 


स्वामी रास । 


भारत के लिये स्वामी राम के प्रस्थान करने के अवसर 
पर होने वाली एक विधाई की सभा में नीचे लिखी कविता 
यढ़ी गई था। 

4086 000९७ 0790]6? ॥6४/४0 (06 [9768 

फिद्या॥9 ठाध्ााछड 0 प5 [8 68860 ॥768 

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एफ पण5 लाबाएंए8 ९४7४७॥ए 9]9806, 

ए6 दरा0 ६0 (8९७ थी 20006 79प्र्श 96 

जीत गाणप्राक उंत 50व, 2०0 ७०70 70 ४86७, 

देव दारुश्रों के नीच की सुनदली फीयल की तरह-- 

रास अपना कल्याणएकारा पाक्तया हम खुनाता दे | 

पूच के पांदित्य से खूब लदा हुआ 


पत्र मजूबा,. ध्रे 


वह उसे हमारे परश्ेचमी तट पर फेल्ाता है, 
राहगीर उड़ती हुई चिड़िया ( के समान ) 
चह बादशाह का सन्देश खुनाता दे । 
ओर उस की यह रुपप्ट गूज़ती हुई पुकार ! 
सब, सब परमेश्वर के लिये, ओर परमेश्वर 
सब के लिये ! ” 
वह अपना सन्देश खुना चुका, अब वह द्वतगामी उढ्का 
की तरह दूर को उड़ता है, 
केन्तु स्वर्गीय व॒ह्नि का एक चिन्द्र छोड़े जाता हें-- 
अर्थात्‌ अपनी सम्पूरण जाति के लिये एक नवज्ञात प्रेम । 
अन्तिम नमस्कार ! मधुर राम ! तेरी प्रभामयी मुसक्यान। , 
पाताल लोक की आत्मा को भी भटकाने चाली है, 
ओर चाहे इस परिवरतेनशील भूलोक में फिए दम 
५ ्त मिले, 
पर हम जानते हैं सब भत्लाई तरे दी लिये अवश्य हे, 
क्योंकि तू पस्मश्वर में दे ओर परमेश्वर तुर में हे । 
32 | 8४ | 8० | 


६७ स्वामी रामतीथे. 
70906, 


34807 7.709प्त7., 
१ 

१00, 70 078 6७7 ४(078 706. 
889, एश0 ९०प्राँचे ॥8ए6 पध[ पा'80, 
6.0 एए0० 60प्ग0 8/॥07॥6 776 १ 
२०0, ॥0 ०708 6व7॥ ७६008 776. 

+2 
प्‌॥७ ९ए07]0 $प्राणरा8 88708. 
[0 एधोर९ 7007 407" 706; 
प्‌ 60080, 378 278 74/ं8! 
# 70 ६6 ४800ए8 7णञप्र् 66. 

ठे 


3 6०9९, 0 ए०0पए 066७॥! 
3) ए0७ पए 3॥१ 927४; 
(7 9०ए260 पर 800 8९0'666 प्र. 
36 67766 पर, 0९]१87४ 
4 


(2, ॥0प्रा(शा08, 0€ए७१७( 
(४008 706 77 कए एकए ; 
जि0पा' 08 एय!] 96 3॥9॥॥0"80. 
जाते 88"९प ६0-089. 

5 
0 )ए5 भ११ 009णव्वा60678! 
गए 48707ए $0ए8! 


भरी । 


वादवता 


गसनशूत्र धरकाश । 
१. 
।ह वहीं सुझे मवा खकता । 
- बताओ, फोच झुझ्ले द्वानि पहुंचा सका, 
ओर कोन मुझे सना लका! 
कोई नहीं, कोई नद्ीं घुके समता खकता । 
रे 


दुनिया एक तरफ पलट जाती है । 
दिये स्थान खाली करने को; 
में धधकृता छुआ प्रकाश आता हैं, ! 
ओर छायाएँ: मी को वाधघ्य हैं । 


ट्री 


// 


में आता हूँ, ऐ तू साथर 
विभक्ल हो जा ओर राह कर दे; 
या श्ुुन जा और ऊकुलस जा, 
सूख जा, चल दे। 
ऐ भूघरों (पवेतों! ) सावधन [ 
मेरी राह से मत पड़ो। 
तुम्दारी पललियां चकनाचूर हो जॉयगी । 
आर टुकड़े २ उड़ जॉयगी आज्ञ 


न 
ऐ बादशाहो और सेनापतियों 


०5. 5 


॥ 
मेरे मानलिक खिलोनों ! 


घ्द ' स्वामी रामतीर्थ. 
मछ४१8 9 0प६28 0० 78, 
॥॥४86 टा6क7! एड 0098! 

6 
64 ए8९78 ह0त 00प7568॥078 ! 
३2787, एए8866 ग्र0६ ए007' 07880, 
ए८३, 76 पृ 79ए 0705, 
]06ए0प7 ए७७, ए8, 28860. 

7 
(0, ॥0ए)] 09, 0 एगांग्रप5, 
() 77 6088! ॥0ए)7 788. 
7686, 06४6, 9508! , 
0 7एए 2प्र्टीट5! 9]0ज 4768. 

8 - 
| 708 >3 $86 77९77768/8. 
6 80706 07 #70 (४४!७ 
४ए एए॥ए 48 ह6 िशापिए ४९. 
॥॥ए 8॥0(8 76ए6४ ७. 

(॒ 


ब 


3" 0888 ६७ &॥0 0770877087, 

व €द्वां; 85 3 8826. 

प।6 [९०६४ 07 &06 ४707४ क्षंए5, 
पाल 48708 870 ६86 8९8४8. 


30 


ये काल 0 आए आाध्वाव0, 
पृपाह मवा65 200 ६96 ७008. 


काकचा. ६ 


दो! 


राह साफ कर दो ! मेरे लड़को 
मे ६5. 
8 0 पी. 4 ञ्े कर 'थ्छ्‌ 
मंत्रेयां ओर उपदेशका / 
कृपा ऋरके जुबान न लड़ाओ । 
हां. भरी आज्ञाएँ मानो। 
झत्यु, तुम भक्तषण करो। 
5, 


छे पवनों ! आओ, भोंकों, 

के का कप ० 

पे भरे कुस्तो ! स्वच्छुन्द भीकी | 

स्लो, चलो, तूफानों । 

'ऐ मेर बिशुल्लो ! स्वच्छन्द फ्क्षों। 
प्र 


मन 


तूफानों पर खबार होता हूं, 
सज्ञ वात ( आन्धी ) पर चड़ढ़ी लेता हूं । 
मेरी चन्दुक विजली 
मेरे निशान कभी नहीं चूकते । 


रे] 


# 


श 


शिकारी की तरह पीछा छरता हैं , 
पहाड़ी, भूमियों, 
ओर सागर के हृदयों को । 


हा 224 


पकड़ते ही खा लेता हैँ। 
१०... ४ 

में अटका लेता हूँ अपने रथ में । 

देवताओं ओर साग्य देवियों को । 


ध्द स्वासी रामतीर्थ-. 


४१0०) ॥7प४्06॥' 07 ७४४४०7॥. 
777009४77  807080 : 

33 
8॥976 | 8976९ 07 [)6प्रशंणा, 
एछ776! प्रधार७ एप! 56 #7९८. 
/06४%9 ! 3॥06+9 ! 
306४५9[! 0४! 

पज़फ ४007. 


6७ 7007 97 86008 ०7 ४86 9छ7 0777 एुथआ'वैशा, 
एफ करा0णा 8ज़ाह98 णा ए6 एैंगावे5, ॥6७' एैं०४८ 
म9908 07 गराए ए७"पशा३, 
एए६ 7.700पर2/0! 0 ॥06 7700ॉ ९ | 0६ शी।77760१४, 
॥0ए मै शत0१8 [ 
[]6 006९26 ॥600[07६  जछ्ञा79 ४06 87, जागी6 'दघ्छांगए् - 
पु0ज 7 ॥7४०/४! 
06 77007 0 व 048 07 ॥6 0088 07 6 शठ्ए&6ड. 
25 श॒पांवे९त 07 20९एए7'8 69 हप्रांव७ 00 ६06 906- 
५06 77000, (0॥ #0० 77007! 5088 967७॥९४ 07 7868, 
(/बर४5 8800फएछ95 820 85 60 84 ए 00 ह6 0726256. 
. 687700॥, 00, 6 88 77) धै6 ]478 07 #6 8]य68- 
(00706, ९४४(०॥ 776, ए07४ 7700776 ; जाती 76 60पात 
ए0प 79९ 
॥6 77007, ॥0ए ४086 श्रंगर6४ एप 09868, 76 
85! 
506 टाब्वए08 गीशा 0ए गरिएु००४ 0१ गंदा, 800 ॥60छ 
व्ाालं)2 #6ए 87'8/ 


कविता. ६६ 


'तोप की गरपह्न से आप 
इस की दर देशां में घाषणा करो ; 


भाड़ दो, ही. दो माया को , 
जागो, ज्ञान पड़ा, स्वतंत्र हा जाओ, 
'चाह स्वाधीनता ! ओह स्वाधीनता ! 
ऐ स्वाधीनता ! ४ ! 
ह चन्द्रसा । 
चांदनी मेरे बाग के उद्यान पर सोती है । 
चन्द्रमा मेघो पर कूलता है, उच्त का छवादा मेरे वा 
| पर फड़फड़ाता है । 
चांदनी ! ओ चांदनी ! केसी भलसत्नाती है, फेसी 
कभिलमिलाती हे ! 
अकाश से खुगन्धित भशोरा, .चूमते समय केखा 
ठिठुऋता है ! 
७१ ७ 


चादना उत्तरात। द्ू छादा लहरा का नावा पर 


के (34 


मन्द्‌ ककोरों से सब्चलित वे भोत् में राह दिखाती है । 
चन्द्रमा, अरे चन्द्रमा ! वद्द पेड़ों पर जा बेठता हे, 
ओर, उन पर छाया और प्रकाश डालत! है जो पवन 
पर शासन करते हैं । 
ऐ:+ किक ४० (कप (कप ् चर 
चाँद, अरे, वह आकाशे। की झील में तेरता है । 
आओ, मुझे पकड़ी, तुम चन्द्र | मेरे साथ तुम उड़ 
न्‍ सकते द्वो ? 
न्द्र ु कि ० [ कक. | 
चन्द्रभा, कैसा वद्द अपने साथी खिलाड़ी तारों से 
मिलता जुलता है ! 
अकाश की उंगलियों से वह उन्हें चिपटाता है, और 
फैसे वे नाचते हैं ! 


//$ 


१ 


१०० स्वामी रामतीथे. . 


गु॥6 77007, )0ए ह6 वए९0१ कं शी8 8४६९४ ० & 7905: 
प्6 6क्चफां, को) 760 56९/४६ क्ाते ६007 707 407 ६09 
(एए]॥0 [606 ए०ए धांड 06877, 0 शोए6ए फिज्यो? . 

जर 0९ 8 ॥७ए [806 800 शंए९ए 8०0 थी. 


न्‍अननननजानतर»«ममीयाम. ीणवयकररामामजफमनकक, 


0 पाप 7008 09 एप्तछ्न फफाप, 
॥॥ 


४(00॥86 70 0 ॥7ए 87876 एांगि ए0०फ' .्र०पशंपट5- 
ऐवग ए०प्राए ।6ग्रांंं०78 870व $९87"8. 
एाउंफ ए०प्रए 880 :07800वंए28 80एवे 46६78, 
ए्रछछ एए 075 धा6 तैषा॥0.?? 
300 ४060 ऐप ०076. 

9 
+छजलंग्रह् 70 4078 एक्षंत 07 ९७77४98268, 
४० ॥0786 670९ ज्ञांगरि एकएंग४ फॉपा768, 
5 एज 6 हुछाा 807ए 07 068४ पीएा68, 
छिप जाग 708 00 7ए 77688, 
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कचिचा. १०१ 


० ७३ बे 


चन्द्रमा, एक लड़के की आंखों में केले उस ने गोता 
मारा, 
लड़के ने उस के सब भेद ज्ञान लिये शोर उले खिलोना 
समझा । 
ऐ चांदी के गेद, किसने तुझे यह रूप उधार दिया ! 
डस की भकलक ओर चांदी और सब कुछ मेरा स्वप्न हे! 
। 


मुक्त की क़न्र पर । 
१. 
मेरी क़न्न पर अपने शोकों को लेकर 
अपने घिलापी ओर आंखुओ को लेकर, 


है. 


अपन भया आर दुखद आतन्तए्ठ दशना का कर, 


' जब मेरे आठ गूंगे हें, 


तब इस तरह मत आओ | 
२. 


डच्चों की लम्बी गाड़ी न लाओ । , 

न लदद॒राते पंखो बाला कोई घोड़ा लाओ, 

जिसे भोत की क्षीण मददिमा प्रकाशित करती है । 
किन्तु अपनी छाती पर हाथ रक्‍्खे 

मुझे आराम करने दो | हि 

अपनी करुणा से मेरी धूल का तिरस्कार न करे, 
ठुम जो इस निजेन तट पर छूट गये हो । 

अपने दुःख भोगने ओर खो देने तथा रज़ करने का, 
यह तो मुझे छरना चाहिये, जेसा कि में करता हैं, 
ठुम पर करुणा । 


१०२ स्वामी रामतीयथे. 


५ 
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कवित्ता. श्च्३े 
छ् 
बे पक 
ज्ेये अब कोई कठिनाइग्गं नहीं हैं, 
कटुता , दिल में दर्द, ओर सूगड़े, 


किये 


दीन प्राणयों | अन्धक्तार से भयभीत छुए, 
ज्ञो आने की चिन्ता में कराहते हैं । 
केला चुपचाप, में अपने घर जाता हैं । 
अपना शोकमय घटा बन्द ऋरो 
में चंगा हैं । ? 
७३५७ 0 + ऐ 24 
म॑ ठुक जानता हर | 
(१) 
में छुक जानता हैं, | तुझे जानता हूँ, ए प्यारे, 
तुम मेरी नज़रा से चाहे बच्चो या टलो या लुका, - 
तेरा हृदय मेरा है, में उले पाथी की तरह पढ़ता हूं, 
पे प्यारे ( में तुझे जानता हूँ, में तुके जानता हूँ। 
(२) 
स्रभगों की काली पोशाऊे और घुड़कियों के वस्त्र 


ऐ प्रकाश ( य चिमनियां ओर ग्लोब तुझे छिपा नहीं सकते, 
में तुके ज्ञानता हूँ, में तुझे जानता हूँ, ऐ प्योरे ! 

(३) 

मधुर, मधुर, है तेरी सुसकयाने, 


मधुर (है ) फररयां ओर धमकियां ! 


कं 
2 


५ 


१०७ स्वामी रामतीथे- 


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कावित्ता, १०४ 


चह अमृत का सागर दे, जिसमें तरंग ओरफेना उठता हे, 
में तुे ज्ञान्ता हैँ,मे तुझे जानता हूं, ऐ प्यारे ! 
+ 8. 
लुझे न जानना विपत्ति है, 
तुझे जानना परमानन्द छे, 
. नक्तत्नों, पचनों, और फूलों में में तुके गले लगाता और 
चूमता हूँ, 
मे तुझे जानता हूं, में तुझे ज्ञानता हूं, ऐ प्यारे ! 
प्रेम का उत्सग (भ्रट) 
' ऐे प्रथा) मेरी जान ले लो ओर उसे आप के समपंण हो जानेदो, 
ऐं प्योर | तू मेरा हृदय ले ले ओर उले अपने से विल्षकुछ 
भर जाने दे, 
हे परमेश्वर ! तूमेरे लयन ले ले और उन्हें अपने स 
मतवाला हो जाने दे, 
है प्र्चु! मेरे हाथ लेले ओर उन्हें तेरे लिये, सत्य विषय 
पसीना बहाने अर्थात्‌ पयत्न में लग जाने दे 
छझुन्दर नेत्र वह हैं जो प्रकेट करते है खुन्दर विचार को 
जो कि नीचे दहकते हैं,अर्थात्‌ निचले लोक जिनमे दहकते दे । 
सुन्दर अधर वह हैं जिनके शब्द 
डदय से उछलते हें पक्तियो के गीतों की तरदद। 
छुन्दर दाथ चद् हे जो करते हे 
ऐेखा काम कि जो उत्सुकतापूर्ण, वीर और सत्य है । 
प्रति क्षण सारे दिन भर । 
में न जन्मा था, न बढ़ा, न मरा । 
शूगी प्रकृति शरीर द्वारा काये करती हे । 
चह अदहकार है जो बोता ओर काटदता है | 


३55 ३3१७ 


न कि में, (जो हू ) निवेकार आत्मा । 


[० 


१०६ स्वा्ी रामतीथ. 


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कवित्ता १०७- 


शान्ति नदीवत्‌ बहकर सुझमे आती है । 
शान्ति नदी की तरद्द मेरी ओर बहती है, 
- शान्ति सागर की तरद्द मुकम लद्दराती है, 
शान्ति गंगा की तरह बहती हे, 
चद्द बहती हे मेरे सब वालें। और अगूठों से, 
अरे जददी ले आओ मेरे ब्याह के कपड़े, 
प्रकाश के एचेत बख, सोने क्षी चमकीली किरण, 
ऐ लो ! देखो ! सदाके लिय घूँघट परे हटने को,फिसलताहै | 
बहो वही, ऐ सालो ! सुन्दर ओ छुन्द्‌ बह्ी, 
दृ्ष के आंछुआं क हारों ! वही, स्वच्छुन्द बही | 
कैसा छुन्द्र प्रभामंडल, अद्भुत्‌ छद्ला है 
पे जीवन के असत ( ऐे ज्ञाद सरी शराब | 
शरीर आर चित्त के मेरे रोमकूपों को मरने को 
आओ मछलियां,आओ कुचा,जिनकी इच्छा हो सब आश्रो, 
आओ प्रकृति की शक्तियां, पछी ओर पशु, 
: मेरा खून खूब पियो, मेरा मांस ज़रूर खाश्रों, 
अरे आओ, इस व्याहके सोजप ज़रूर शामित्ष हो जाओ, 
में नाचता हूँ में नाचता हूँ अति प्रसन्‍्तता से 
तारा में, सूथ्यों में सागरों में स्वच्छ 
चांदी ओर मेघों में, पत्नी में में नाच वा हूँ, 
में गाता हूँ, में माता हूँ, में स्वरसास्य हूँ । 
में स्वस्कष्य का असीम सागर हूँ । 
दृष्ठा--ज्ञों देखता हे, 
पदार्थ- जो चस्तु देखी जाती दे, 
लहरों की भांति वे सुझमे दुने हो जाते है, 
मुझम सखसार एक चुदवुदा ( वुलचुला) 


हे 


श्व्८ स्वामी रामतीथ 


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फएत, रावत 89०णपंग्र एशी उछा; 70ए6 967- 
999778 704772 00 40? 
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४६ (पी, (पा।॥ 407 898776, 0॥8 एश) 00 77076, 
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ऐेायत १400४09"8 ०७ 0827४ ४8. 
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70 0ए४०७"शाश४ 98 0एछ7फ, 
वी १8 कर्ण एशंगाएह 78 ६0 76, 
5 एशपााएु 708९8 607. 
[( $8 रा एश7977898 7७४7 ६0 7786. 


कविता. १०६ 


शान्त वा सावधान हो । 
“इसने पीले ओर विवरण क्यों ? 
में तुझसे विनती करता हूँ, इतने पीले क्‍यों ? 
इच्छा, जब भलीचंगी दिखाई पड़ती है, उसे डिगा नहीं!संकेती, 
तो क्या चुरी दिखने पर प्रभाव डालेगी ? 
में तुमसे विनती करता हूँ, इतने पीले ओर विवरण क्‍यों ? 
ऐ युवा अपराधी ! जड आर सूक क्यो २ 
में तुमसे विनती करता हूं, इतने मूंगे क्यो 
इच्छा, जब बोलतीचालती इच्छा उसे डिगा नहीं संकंती, 
तो कया कुछ न बोलने चाली इच्छा उसे डिया देगी ? 
में तुझसे विनती करता हूँ, इतने गगे क्‍यों ? 
छोड़ो छोड़ो लज्जित होकर, इच्छा डले पिघला न सकेगी, 


यह उसे नहीं ले सकती ; 
यदि अपन आपही वह प्रिया प्यार नहीं कर सकती 


तो फिर किसी तरद्द उसे सस्मत नहीं किया जा सकता, 
के शतान उस भअहण करे ।? 
3४ | 35 |] ३४ !!! 
यह मुझ पर वर्षा नहीं हो रही हे 
यह मुझ पर वर्षा नहीं हो रही हे, 
नरगिस के फूल बरस रहे हैं । 
भ्त्यक पचके एुए बूँद मे मे देखता हू 
जंगली पुष्प खुदूर पद्दाड़ियों पर 
भूरे वादल दिन की घरे है 


ओर नगर को दवाये हैं । हर 
यह मुझ पर पानी नहीं वरस रहा है 
यह तो ग़ुलाव वरस रहे हैं 


हक ५ 


यह घुरू पर वर्षा नहीं हो रही है । 


/3 


[[/9 


११० न्वामी रामतीर्थ- 


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0ए॥ह७8४ घाए >पटटकाएश१78 86 
विज गाते 8 ७6ते धातवे 7007. 
4 व९क्लोगिए प्रग्मा० 6 ॥80]9 ! 
4 ग8 707 0 ४0 7७ ; 
-ई 45 206 #खंए/8 7६४7 ४0 208, 
[ 5 #ऋ्बांएंध8 ए४0/608. , 

5,007) 00,6 7" 0४४. 
(0!ए त7€९6६ 0]00त ॥'९४/४0058, 
369६ कक 87065 धाते । एशंप5, 
शिब्राह कक था), 8076 800 एथॉ27, 
4 0#8' 76080078 &/'8 9 2६75 
उ3छा6 6 #णा€, गाए 0000 0/ 9700प | 
76 70पर्णाह्चाए$, एए27/8, 5प70 धाते >ाप्$, 
एजञ68, ॥॥65, 7१0९7"8, 507्न शत 7हंत5, 
रज ग67४ 04 #एच्वाए जीछी' 0५ ९०पॉदवातड, 
()९९४४78, एशंशते5, हम्ववे ९६"008 8 7ए्रातंग 2 
3 706 88 0 श+ ७॥68. 
वह, ंग्रीएं(6 त0ए ९५)०९०5४९७ 
तर 8९8५९.) ए क्रापह्ल6 टले९5वव) 8/'तांगरड, 
8 8बाफणरु तेा।0]8 0९ क्वा5 0 58 
ने छ0%९7 ई0770 47 90प्राप॑ए९ 70. 
पर ए९०व0घ४७ 8078 ०९ ६00 (87:288, 
एफ शाप्रष४ं७ 0 ६06 ए४७ए77९9 07९8, 
पए6 2९७॥०९४ 0 6 00682778 रा, 
प॥6 ॥0ए778 0०7 ॥॥8 700. 
(१8 ॥0एं0 ६'0]8 0 0०, 


कविया, ऊ'. एृ११ 


॥४22६ 


किन्तु घास के मेद्रान खिल्ध रहे 
जहां कोई डाकू भीरा 
विस्तर और कमरा पा सक्के । 
खुखी के लिये सुखऋर ! 
उसके लिये तिनकझा, जो भुँफन्ना रहा है, 
यह मुझ पर पानी नहीं। बरक रद्वा है, 
यद्द ते। फू वो का बरई हो रहो ६ । 
सगे सबन्‍धा। 
अरे मेरे सीधे एक खून के सम्बन्धी, 
नसो और नाडियों में फड़ऋंते दूँ 
पोधे, हवा, प्रक्काश ओर पानी में 
अन्य सव सबन्धी केवल बंधन हैं । 
हड्डी की हड्डी, मेरे खून के खून 
दे पहाड़, नांदेयां, खूये और मेह | 
फूल, केवल फूल, इंसते और घछुसक्यते हैँ 
मेरे दिल के दिल में उचकी खुशों समाई है । 


५ 


5 


सागर, पवन और भूमियां झुक में ऐसे दोड़ रही हैं 
जैसे शहर में गल्ियां । 

मेरा अनन्त,अनन्त हपे प्रकट होता दे ) 

स्वर्गीय संगीत में, दिव्य स्वरों में । 

शआंखुओों के तारों के चमकते दूँद 


में गिरती वर्षो में बरखाता हूँ, 
मधुर गौत गेगा का, ह 


लद॒रंत हुए देवदादओं का समीत, 


सागर के सम्रम की प्रतिध्दीनयां, 
मौशों का रेसाना, (वम्धाना। 


ओखस के तरल दूँद । 


2 


११२ स्वामी रामतीय्थ- 


ग।6 ॥67४४७ 050॥798 छैणाते, 

पुत्र कब ९07 0| 0 वीए ईएएॉ, 

ग्‌॥6 ।8प0/0" 0 06 005पे, 

गृह एगेविला 9९चा एए गी९ पा, 

पृणा6 छपग्रीर्व७ ० 06 छीशा। 5007", 

[0 8॥॥77एप8 ॥8 ० 0४ ह]00"0 ॥राए07, 

ज9000॥78 059/8 कए्या' ध्रापे 487५ 

6 वीगण॥ 07 ॥6 वीहागांग[ ए७ताते, 

७ शृठ ० 00 ]९ए९ी४ ट्री), 

[6 हीएया 07 6 ग8॥६%॥0050 ९४007 3ंह[, 

व ॥॥6 तत्पर एगते 40779 ४४४, 

प्‌ 0970 908076व हवा बाते ॥00ए९॥75 हु।07005 
'जएवोवी, 

प)6 इ०एादी९४55 80एातै, 00 गिशफपशे6६५ ।8(, 

वाल तानेत९55 तेशनेर गणते छांत्रह्ठी ९४५ क्‍ीह।ई, 

॥॥0 ॥7794058 (079 ९ €एटे९55 अंट्री(, 

प6 770प6858 (80, ॥96 ॥070]085 (7850 80 प्री, 

कया 3, था) 3, था) न. 
(0). 


प्रप्त॥ एए४0फ४,9 पात्रान ५0.9 78 5४ए दता7! 
70 377. 

ए 8९६, (॥6 8७ 48 है (0 ॥0, 

पपा९ 909, मंगल ॥ 80९8 फावां ८७७ मैं, 

34 400800 )॥07"७ ६00 ६0078 07 ९६ (0 00. 

व्‌ छण कएए8वए0आाड 5९0 ; 60 00 000ए 8 87808 

89॥09 

96 १जाहते जिरिश' गाते शीधिएश' 9 पए जाते बफ्मए 
(7णाए 00, १8 068580708, 0०० 09), ३6 90४75; 


कविता: ११३ 


भारी नीचे उतरते मैघ, 
नन्हे चरण की धपथपाहइट, 
. भाड़ की हँसी, 

सूर्य का सुनद्दला ॥करण, 

भौन नक्षत्र की रकपक, 

रुपहले चोद की मिक मिलाती चांदनी, 

दूर ओर निकट प्रकाश-प्रसारिणी, 

लपलापाती तलवार की लपक (वा चमक) 

उज्ज्वल्ल रत्नों की दमक 

प्रकाशग़द के संकेत-प्रकाश की पभ्षा 

' अंधेरी ओर कोहरेचाला रात में, 
सेब-गर्भवाज्षी पृथिवी ओर बैकुठ का विशिष्ट घन; 
शब्दद्दीन शब्द, बिना लू का प्रकाश 
अन्धकार हीन तम और बर्षली की उड़ान 

चित्तरीहित विचार, नेन्नद्दीन हाप्टि, 

मुखद्दीन वातचीत, बिना द्वाथ की अति दृढ़ पकड़, 

सब में हैँ, मेंहँँ, मेंहँ। 

ु राम, 
दुनिया, मेरे लिय दुनिया नहीं हे 
मेरी आत्मा, यह आत्मा, मेरे लिये सब कुछ हे । 
देह, यह चाहे कहीं जाय, मुझे इसकी कया परवाद्द 
यदि यहाँ और वहां उछली पुछली ज्ञाय, या मस्ने के 
छोड़े दी जाय, 
में स्वाधीनता का आत्मा हैँ, शरीर ज्ञार समुद्र के फन की तरद्द 

चाद्दे इधर ओर उधर या ऊपर शोर दूर ठोकरें खान 
ऐ खुली | तुम आओ, ऐ दूदों ! तुम आओ, 


११७ स्वामी रामतीथ- 


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मीठा 776 ॥0ए 7 38 0) (शाही, 


कविता. श्ष्श 

सुझे तुम समान हो, पएक्त समान, एक समान, 
सूर्य प्रकाश करता है वागों और वेलेद्दी ऊछरो को, 
भाग्य के रूव परिवर्तत में एकर्सां 79काशित करता हूँ। 
पवित्त ओर ऊँचे, नील आक्ाशों का विशाल सागर, 
कभी प्रभावित नहीं होता, मेघ आते शोर नाश दोते हैं । 
जीवन या मृत्यु और स्वस्थता या दीमारी, 
मुझ में भाषों की तरह उठती, खेलती ओर मिट्ती हैं । 
जवानी की सीधी लक्चीर ओर आयु (उम्र) के चक्कर, 
सुझपए शाकृतियां की तरह ऐल हैं क्षेसे पत्नपर लकीरें। 
सफलता या असश्वफल्नता से मेरे लिये काई अन्तर 

नहीं पड़ता, 
क्योंकि में स्वतंत्र हूँ, में स्वतत्न हूँ, में स्वतंत्र हूँ । 
मेरी स्वाधीनता की वित्ता डोर वाली स्वतन्न पतंग । 
सब ग्रहों, सूय्यों, नक्षत्रों ओर आकाशों को 
बहुत पीछे छोड़ दती है, तथा ओर सी ऊंची उड़ती है । 
पूरे कलेज से में गाता हूँ, आरद्वाद के गीत, 
में स्वतंत्र हूं, में स्वतंञ्ञ हु, मे स्वतंत्र हूं ! 
दुनिया, दुनिया मरे लिये कुछ नहीं है । 

राम ! ३४ !! 


नमस्कार (खुदा हाफिज्ञ) 


चग्द्रमा निकल आया हे, वे चन्द्रमा देखते हें, 

तेरी आंखों की पत्रकों का प्रकाश में पीता हूँ, 
बड़े,तमाशे वे करते हे जिनसे पूरा सीड़ दोती हे, शौत्र 
में ताकता ओर ताकता हूँ तु्े, ऋो दाऐ का सूल हे । 
नहीं, किसी जरोह को न चुलाओ, न किसी हकीस को, 


॥५० कह ॥० मी. 3 


क्योंकि मेरे लिये मेरी पीड़ा पूर्ण आनन्द है । 


// 


११६ स्वामी रामतार्थ- 
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कथछिता. ११७ 
नमस्कार | पे नगरसनिवासियों ) नगरो, नमस्कार ! 
अरे चकरानवाली, आकाशी ऊँचाइयो ! स्वायत, 
ऐे परिपादी, प्रथा, नेकी ओर ददी ! 
दे क़ानून, नियम, शान्ति ओर संग्राम ! 
पे मित्रो ओर शन्नुत्रों, संदंधियों, वन्धनो, 
अधिकार, विकार, गलत ओर सद्दी ! 
नमस्कार, ए काल और देश, नमरुकार ! 
नमस्कार ! ए संसार और दिन तथा रात ! 
फूल, खेगीत, भक्काश 'मरा भ्रम है । 
मेरा प्रेम हे दिन, मेरा प्रेम दे राजि, 

>सुझ में लीन होगये सव अन्धकार और प्रकाश | 
अरे केसी शान्ति, शान्ति ओर खुशी हे ! 
अरे छुझे अकेला छोड़ दो, मेरे प्यारे ओर मुझे | 
नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार, 

कु राम, 

प्रस । । 
प्यारे छोटे फूल, अपनी ओसीली आँख से 
इधर देख ओर मुझ से सच २ क॒द्द दे, 
जब फेई समीप नहीं है, 

“तब तू ौया है | 
' फूल ने कोमल आह खे उत्तर दिया, 
यदि अकेले में यह वताना हे, 
तो मुझे डु'ख पूर्वक मेजूर करना पड़ेगा, 
» के तुम कभी न जानोगे कि में क्‍या हैँ। * 
क्यांकि मेरे साई ओर वहने सब ओर है 
हवा में और धरती पर, 
ओर वे वही हे जो में है । 


श्श्द स्वामी रामतीर्थे- 


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प्रणा& 789५0 7९6४० थाए 4, 

प्र०फ् €७४॥ए 7॥ए ४6७८४ 4 800076, 

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कचिता- ११६ 


बाद रे आनन्द ! चाह रे आनन्द ! बाहरे आनन्द ! 
खिलदड़ी वायु में हूँ, 

किस कोमलत। से तेरे गाल में पीटता हूँ, 

जब मेरी छुगन्धित सांस पास से निकलती दे, 
संदेश लिये हुए प्रेम का, ५ 
विश्वास शाक्ति और हर्ष कहा, 

ओर मधुरता से सारी चिन्ता 

सम्पूर्ण चिन्ता,श्राकुलता ओर भय हरती हुई, (निऋशती है) 
वाद रे आनन्द : वाह रे आनन्द | वाह रे आनन्द ! 

छोटी काली चींओ में हूँ, 

जो चलती है इतने चुपके आए तेज़ी से, 

आर बिना शब्दकिये पास से निकलती हुई 

उस संसार में तिससे उसका कोई प्रयोजन नहीं हे, 

ओर जो बस्तुं; उपाजनब करने की हैँ उनके लिये परेशान 


यकि है + भी होती डुई, 
किन्तु बिना गड़गड़ाहट या आहके काम करती निकलती है। 


चाह रे आनन्द वाह रे आनन्द ! बाहरे आनब्द ! - 
जगमगातें। ओऑंसमसें हू, (इस रूप स ) 


में फूलो के आठ चूमता ओर चाधथ्ता हूँ । 

मेरे सूर्य के मधुर बच्चे, 

शुल्ाब, नरगिस, बेल, कंचल ( जुद्दी ) 

चमेली, मोतिया,चस्पा, चॉदनी, 

घास; पत्तियां अर बाज में पालता ओर पोपता हूं, 
उनका ज्ञनक छूट गया हैं, शिशु आराम करते है, 
ऊंची हवा से मउनके पास उतरता हू , 

आर दुध ।पत्तान का अऊक्रता हू, 


३४७३ आज हक 


थे सोते हैं ओर पीने के तरल सिरे चूसते हे। 


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१२० चवामी रामतीथे- 


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4 


बिता १२१ 


2) 


वह आता है सूये, मेरा प्यारा 
बच्चे मु सफ्यांत ओर झपनी आंख खेलते हैं,. 
ओर जब में पता पावा हूँ 

में हपंभरी आहा से पिचल जाता हूँ 


८५ 
& 
/ 


अशाःस । 
जोर के घिल्लाप और घाव जे।क्लिछी समय व्यथा और पीड़ा 
ते थे, 
>अच स्तुतियों ओर सालाबत खंगीत ऋला के समान चंडे 
मघुर लगते हे । 
ऐ चोर, ऐ निन्‍्दक, डाकू प्यारे ! 
जदबवी करो, आओ, स्वागत, जरदी,अरे तुम डरो मत, प्यारे ! 
मेरा आत्मा तेरा है, तेरा मेरा है, 
हां यदि तुम्धारा जी घाहे तो 
रूपया ये चीज़ ले जाओ जो तुम मेरी लमभने दो। * 
हां यदि तुम यददी उचित खमभते हो, 
तो इस द्वेंह को एक चोट से मार डालो 
/ या इसे ठुकड़े ठुकड़े काट डालो 
देह और जो कुछ तुम उतार के खकते हो सब उत्तार ले जाओ 
भाग जाओ नाम ओर यश लेकर, भागों, 
दुर ले जाओ ! 
तथापि यदि तुम तनिक पल्नट कर देखो 
तो यहं केघल में ही हैँ जो सुरक्षित और खुस्व॒स्थ दे 
' अशाम, पे प्यारे, प्रणाम ! 


श्श्श स्वामी रामतीथथे. 


7ए एशए58 09 शर॑) ्॒ 88,099), 
3. 


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2. 
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प6 80]47प8 0 तांतआश 8ए७ए ; 
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परह्य 77] ॥8ए४ गरंए 85 | 0076 श0 #8ए8 सट06858. 

3. 

( 0५फऊझछाए(, 

/069 8४४ 6 500 ३8 0एं प8 ए9॥060, 
69 इक ई8६ गधा 48 [प नि 4926, 
प]6ए 889 ।96 जांग्रोर65 40 ६6 एकि8, _- 
469ए 889 6 डाणा]68 वर 78707 ]0फ़७5, 
069 849 ति6 डझंश॒ग5 बजा ?079279608, 
469 889 घु8 0782/68 7 605770 कं, 


कविता. १२३ 


5 6, मर 
र प्यार का तसवार | 
१. 


अरे | अपने प्यारे का प्रतिरूष में केसे पा सकता हूँ? 
उसके सदश किसी चीज़ की क्या धारणा की ज्ञा सकती है ! 
क्या घद्द तसचीर खींचने के येत्र में भरा जा सकता है ! 
क्या चित्रकार उसकी तसवीर खींचनेकी खड़ा दे/सकता है ? 
क्या वह रंग ओर आकार से प्रकट हो सकता है ? 
आओोदह, आ फार का यन्त्र पिघल गया ! 
उसके तेज की वद्दिया अति अधिक थी अति अधिर थी, 
अरे | अपने प्योर का पतिरूुप में केख पासकता हैँ ? 

२. . 
में ने चित्त के एकाम्र किया उसकी तलवीर लेने के, 
नेच्रों को यथास्थान किया उसकी तसवीर लेने को, 
हृदय का केमेरा (यंत्र खड़ा किया) उसकी तखवीर लेने की 
सम्पूर्ण यत्र (किन्तु) गल गया; 
बसके तेज की वद्दिया अआंति अधिक थी अति अधिक्ष थी। - 
अरे अपने प्यारे का प्रतिरूप में केल पालकता हैँ 
तब में उसी की लूंगा क्‍योंकि घुक प्रतिदद वहीं मिकश्ष सका, 


३. 
आवरण 
लोग कहते दे कि सूर्य उसी की प्रतिमा है, 


लोग कहते हें कि मनुष्य उली का प्रतिरूप छे, 


लोग कद्ते ६ कि वह तारा मे भात्तकता दें, 
लोग कहते दे वह खुगन्धित फूलों मे मुलक्याता हैं, 
लोग कहते हे वह कोकिलो मे गातः है 


लोग कद्दते हैं चद विश्व-पचन में लांस लेता हे 


मिल (4 


!/ 


१५७ स्वामी रामतीथ्थ, 


पृपा6ए 808 मर ए९छ08 77 एशंग्रांगरठ ९0008, 
प७९ए 89ए 6 88208 | एशंए७१ गरां278, 
॥6ए 8 ॥76 #प्रा8 य/ 97४78 807868॥78, 
पत6ए 88ए पिढ 8एां॥28 गे >'धांत0ए &"068. 
पुछ् 80008 0 ॥8॥$, [089 885, ि७ 9087'068. 
4, 
50(( ४५, 
९७, ए88, (8 80 
ग।686 407778 04 80806 छगवे (76, 
478 एथ्ापाहआ8 गिघ 80तें 2006078 एंटी, ज़ॉपंदा को 
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" 77७ए १४6०, 80, 4 979ए, 
गा ॥७ए७ 20 ९, 
(40-08 ए. 
23 0७७फार 
जिी8 काह8एछ' ]98॥60 88 अशाणिंए रु 0 ल्‍0ए ॥6थ7ए्5: 
२०, ॥0॥॥67' ४७777, 707' 9]9776९, 
एश्लंणाडह 98७, 90 एं0त0 04 ७४४३७ ! 
4क्‍00 ए०ए४ एंड 776 80 09978 गए हाई 28070प8, 7878 ? 
408 ए0०प 69040, 9९878, 


ग कहते हैं वह जञाड़े की रातें' 


लोग कद्दते दूँ प्रकाश फी बह्धियाधोम चद चलता है । 
न्फ छ 
विनय । 

हां, हां, ऐेखा ही नि 

देश और काल के-ये रूप । 

हैं वस्थ अति उत्तम और मृल्यवान आवरण,जो झाधा खोलते 

झोर आधा ढक्षते हैं मेरे उस अतापी प्यारे को | 

मेरे (प्रेय प्यारे : क्‍यों ये घूंघट और परदे ? 

कया छुस कुरूप दे ? क्या हुमा आमिमानी या ऊपू 

खुले आम निकलने-से क्‍या तुम्द चोट लगती दे 

क्या ये ओढ़ने ओर पद, क्यो ? 

कृपया; अपने को बिलकुल विवसत्र (लेगा) करतो । 

में तुक से विनती करता हूँ, कर लो, मेरी विनय हे, 

नहं। (नन्‍ना) स्वीकार न करूंगा 

आज, ट 
उत्तर । ॥ 

उसका ७त्तर चिजली की तरह मेरे हृदय से काँथि गया; 

नहीं, न अभिमान, न लज्जा, 


मुझे किसी प्रकार का दोष वा उपालम्ब कर्लीकित नहीं करता ! 
वया तुम मुमसे लाहते हो कि में अपना तेजस्वी आत्मा, जो 
बिरल है, उच्ार दूँ? 


क्या तुम सच्चे श॒ुद्धान्तःक रण दो, 


श्श्द्र स्वामी रामतीथे- 


् 


॥]90, एज 00707: ९:00, 3677, 

प्‌प्गीर6 0 था। ॥॥ए9 2०0॥08, 

ह.70 गपाए5९३ दे? ठां528056 4 * 

९४7, $९87' 0प 0॥6 )7658, 

007% ए0ए गरंचे6 एशातव, 

९० 6पाप॑धां0, ]987 070, 

'रधआा76, ध6 07 09 9070. 

(00, ॥9॥700 07 [0088९8500, 

7,09८8, ]267'९(ै5 धादे ]088507), 

(978, 2!787728, 0९४४2 78, 

8]] ४ ]7706 शाते ॥॥76 ?? +९7007008, 7९४४७. 
पिह७7, ॥697' 076 [6 0॥708, 

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कविता, श्र 


सो ए्र क्ष्या नहा तुम प्यारे ! 
अपने सब कपड़े उतार डालते, 

ओर अपने आपको प्रकट कर देते ? 
“फाड़ डालो, फाड़ डालो, परदो को, 

पीछे तुम न छिपो, 
' मन है कोई पदी, टट्टी, 
सलाम, ख्याति या सिर्धात | 

देंह, मन या अधिकार, 

राग, देप और स्नेचिकरार 

दावे, अनुरक्षियां, मनसूबे, 

सच “मरा ओर तेरा” त्याग दो, दर करदो, 
फाड़ डालो, फाड़ डालो पदों फो, 
अपने आपको मत छिपाओ।, 
जला दो, जला दो मोहर को 
नक़ाब की फाड़ डालो । 
आओ स्वागत, पूर्ण स्वागत ! 
ऋक्रपया तुम देर न करो, 
में कहता हूँ, . 
मुझे चिपय्ने को, तू विज्कुल नग्न होजा, 
ओर फिर देखो ! यद्द तू ही है में इतना छुन्द्र, 
इतना उुन्द्र ! 
खुखद मनोहर, कितना प्रिय और मधुर ! 


किक 


' उसके ओढ्ने ते में अपने ओढ़ने ओर चादर पाता हूँ, 


छसके कस्बल और रजाई मेरे कस्वल और रजाई हैं । 


देखो, वह गये कम्बल, 
हि 
दूर (गये) ओढ्ने और रजाई 


श्श्द स्वासी रामती्थ. 


फ्6 8 4, 4 6. 
१९० 796, 5॥8, 288, 07 ४68. ॥॒ 
03)! 0क्ा! 
है पर शत, 
पु.४ 066९8४७ 87९९, ह6 एएशा'ड एएी 
8 ॥९, 7) 7]6. 77 776. 
पु॥6 व0फ678 8९, 70 2९[/ए78 0 ७ - 
यड 708, 4 ॥70, 7 7॥8. 
छा३ ब्राए8 ६7.6 ॥00 #छवे 06888 7888, 
3ंत 706, 0 70९, 70 70€, - 
पृपा 6 र०0प्राका।ह ॥08ए6 #0वे '॥(प्रए७ 00005 
यंग 8, 77 776, 470 708. 
प५6 0०08४४७ १9, 08 770॥0९०078 (९, 
(00 एांजतेड डांश) बाते फिपातेश (8 0५, 
7 776, 77 778, 7 776. 
976 408 00॥९808, 808 74600 86/६३79५8, 
96 770009"' 86९79, 08 ७0५ ए९९]08, 
"9 706, 70 ॥060, 0 706. 
एस ए0छा।ए + 85ए, 8प्परा/980, 8४७ 
१,0 8 एए7, 
तगां5ड [77970 एशी तांत 7॥8 06508, 
38 66#678 ए़७7"6 ॥6708)9]0]6 4098, 
3 दं#िक्षा९श एए8 तु06 76 780९, 
वितांड &थों)र्क 50 ठप्रा/ं0प58 076 685, 
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हज #एाफण 795 90ऐ-ुटोी४६ 6७९ 0ए १8७॥, 


कविता- १२६ 


वह है में, में वह हूं. 
न कोई नर, नारी, में या तू। 


मुझ में 

सागर लद॒राते है, नदियां लुढ़कती हैँ 
मुझे, सुकम, मुझ में । 
फूल सुसकयाते हैं, पवन चलता दे 
मुभम, सुझूमे, मुझूमे । 
बड़े भेत्र लगते हैं और संग्राम दोते हैँ 
मुझमे, सुझूम, घुझम । 
भूधर ( पवेत ) उभरते हैं. ओर प्रकृति खिलती है 
सुभमे, सुझमे, सुझूमे। 
घूमकेतु उड़ते दे, उलका निपात होते हैं, 
शीतल हवाए आह मरती दे ओर मेघनाद चीखता है, 
मुभमे, मुझते, सुभमे । 
शत्रु भगड़ता है, मित्र रक्ता करता दे 
माता सोती है, शिश्ष॒ सोता है 
मुझमे, मभूमे, सुझृम | 

$ ० डे 
: दुनिया में ने देखी, समझी ओर सीरख्ती । 
इस चर्ण-प्रकाशिका ने मेरा अच्छा वर्णन किया, 
इसके अक्षर चित्रशव्द खिलोने थे, 
विभिन्‍न प्रकारों से इसने घुझे अकित किया, 
यह चर्णुमात्रा जो एक दिन वहुत श्रद्भुत थी, 
मैं रही की दोकरी के हवाले करता हूँ, 
में इस पुस्तिका को पन्ने पन्ने करके जलाता हूँ, 


१३० ' स्वामी रामतीथे- 


पु 876 7॥7ए 0709ए डए0घथांएड्ट [0[26. 
] ड्ञा7076 शा 00एछ 4 ॥700520 7ए हञ0फी।, 
१00 फाछदी) ब5 ठप्ोए शाप हु0 0५. 
728 ४ | 5 
80-श0-7. 
7१0 पफाफपत, 
() [07०8७ ! 04,508 | 0,0ए6 ! 
'&9076 900, 8908 800 808ए५४69, 
[॥6७ | ज्ञां] ध्लोफए8 )098. 
0 ५7, ह6 076 ९४ ६ए. 
0१,0ए68 | 09006! (07,0४6 ! 
मजा 58 हर यडए है सफ्ट, 
॥क ७७ । ॥0७ 900 700४8, 
जैयाते 60 77008 77988 4 छुंए2. 
(2,0ए8 !| 07,0ए७ [| 0 4,076 ! 
प० पाल शणाएुड परए ए06 ॥(6, 
[]768 ॥ रणजी ७एए" 8९"ए७, 
-त ॥0 79050 07 ॥070प7 00 80४४९, 
७0 47,0ए08 | 0,0ए8 ! 07.078 ! 
5॥ए छा] १३ ७009 ॥06, 
००५७६ पंत प6 वे० ए00४ए४७० ए॥०घ ६, 
अर ए जो बं5 8 #0ी७९४०त ० पात6, 
१4% 8 (0870' 8; पपप)ह पष्ण, 
36078 ९९७० [900 एछ5, 
868076 ९ए९४ £6 8९8, ४ 
६27 ६॥6 807 ॥थां7 ०६ 70 27955, 


कविता- १३१ 


अपना अकेला हुकका खुलगाने के लिये। 
में अपने सुख द्वारा इस पीता और फूकता हूँ, 
ओर चक्क रदार घुएे को वाद्दर निकलते देखता हूँ । 
राम स्वामी | 
किले [4 प 

हा सत्य के प्रात 
ये प्रेम ! ऐ प्रेम ! ऐ प्रेम ! 
देश, काल ओर वस्तु से परे, 
तुझे में सदा प्यार करूँगा, 
शे! सत्य, एक मात्र तत्व ! 
छे प्रेम !ऐ प्रेम | ऐ प्रेम ! 
' मेश आत्मा ज्ञिसमें में रहता हूँ, 

छुमम में रहता ओर चलता फिरता हूँ, 

ओर तुझ अपने आप को में देता हैँ । 

ऐ प्रेम ! पे प्रेम ! ए प्रेम ! 

सेरा है मेरा समग्न जीवन, 

तेरी में सदा सेवा करूँगा, 

सम्मान या संत्राम के वीच । 
मे प्रेम | ऐ पेस | ऐ प्रेम ! 
'सेरी मर्ज़ पूर्णतया मेरी दे 
'जो तेरी इच्छा हो चद्द करने की तू मुझे आज्ञा दे । 


१ कै 


“मेरी मर्जी तेरी मर्जी की एक प्रतिच्छाया हे । 
श्र 


अमर नित्यता (वा अनन्त काल) 
भूमि की उत्पत्ति से पूर्व, 
ससुद्र से भी पू्च, 
अथवा घास के कोमल वालों, 


ग। 


रैँ 


४ 


१३२ स्वामी रामतीथे. 


(09 ॥॥6 ई27 9095 07 ४6 07९6४, 

07 6 €श॥-९००एए४१ #7एं६ 0/ 79 7070॥05, 

व छझ88, ध0०पे हीए 50एॉ छ88 गए परा९, 

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कपाई ते।पिरते ते 5छपा ; 

006 ०१ 706 07' 06 707'088, 

पृ" ॥क 5४०७ 0 07' 69777, 

0वा 06 706 790 8790 5ए0909, धाते एापे ))९४४ 800 
(0।8 ९९ 

' 8070० 000 ए88, ? 7. 

व धा€ शाधा"र पीछा 38 775860, 

'870 ४)6 ७77"0५8 (09 788, 

जे ४ फ्रछचरीए ईद 45 ऐंइघस्ऐे, 

270 006 768 $7 48 788, े 

496 86870॥ 806 06 80ए१॥ छावे धैढ इ९शेः९७ 


॒ 86 50, 
2870 [॥06 )00ए ४७६ $8, 


4 काएा इबएछ एी86 56 ६700, 

(५6 0ंता .9४008 0 ४6 परां200, 

5९$ ४6 ७9000 6७760 (०6, 

व ॥0०ए० छॉंथं९8 ६0 87४० 8॥7४ 

फिए 68 70077 8 07 3770008826 ६0 758 
070 (06 ४)9009]658 800 48 ३7 शंशा 
चत6 8007 एं7)त5 0 3265, हे 
पृ30एछ ई070पथ्री] 778 87वें ०९४४९, 

पफ़6 ए७7ए-एांग0ते ई86 782०8, 

76 207778-ए7760 07 96908, 


कविता. . १३३ 


था पेड़ के स्वझ्छ अर्गों, 

अथवा मेरी डालियों के ताज़े रंगीन फलो ( खे पूर्च ), 
में था ओर तेरी आत्मा मुझ में थी । 

प्रधम जीवन भरे उद्वमस्थानों पर 

पहले बहा ओर तेरा, 

सुझ से निकल कर, या शक्तियों से 

जो उसे बचाती या नप्ठ करती हैं । 

मुझ से पेदा हुए नर ओर नारी, तथा चनेले पशु और 

पत्ती , 

परमेश्वर के अस्तित्त्व के पहले “मे हूँ” था। 

में चद लक्ष्य ( हूँ ) जो घच जाता हे, 

और बह वाण जो चूक जाते हैं, . - 

में चद्ध मुख हैं जो चूमा जाता है 

आर चुस्वन म सांस में है । 

खोज ओर जिसे खोज्ञा जाता है श्र खोजनेयाला, 
आत्मा, ओर देह जो है ( यद्द सब मे हु ) । 
मे हूँ देखनेवाला जद्दां ठुम चलेत हो 

रात्रि के घुंधले मार्ग । 

यह छाया जिस का नाम इंश्वर हे में ने स्थापित की, 
तुम्हारे आकाशों में पक्राश देने की । 
_किल्‍्तु शान की प्रातःकाल उठने की, , 

फिर छायाददीन आत्मा रश्गित द्वोता है । 

आुगो फी तूफानी दवाएं 

भरे द्वारा चलती ओर बन्द होती हैं, 

समर-वायु जो प्रचंडता से चलती दे, 

शान्ति की चश्तन्त-पचन, 


श्श्छ स्वामी रामतीथ्थ- 


फ-8 76 /789/ ० गिशा। 7'0प्80 ७० 779 "६8868, 
क्गा/8 6ए6 0 70ए 7088008 उ7078888. 
87] +077708 07 &! 48८४४. 
65॥ ए०जरढ ती 20 ॥8708, 
प्‌ प58४7"८१७०)४ 928085, 
(7 ॥7776-8४एं ९९९४ 8008, 
हैगते 46४8॥४0 809१ 2! ]76. 
47वें थी >लंश्ा5 छत क। >परांग8, 
0709 97707029 78 88 88708, 
(९), 777 8095, (०, $00 (प्र70. 
पि0ज़ध"णते5 600 ४0६ 0६ ४९, 
छात्र ०० । &00प7स्‍87 #>8क्वपर४7ए7, 
४४5 $6 रक्चा'वे 40 06 4766 ९ 
आता, ०धाणवे, व्‌ थ्ाव छांगि ए०प शाप व ए०प 200 ० 
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प,00६ 0७४४0 श0एछ ये 8९९. 

पल 8080छाग्र! 08 8706885, 
ह0ण७ 7675, 00708 9रंं7007, ए6 7707ए 070, 
470 शी 76 & 8007ए 60. | 
उफर 808 ए०प 9ए2ए5 ॥9]009ए धाते शो&प, 
गत ॥6ए6" 8 00806 07 8070४ 0876 ९ 
ग॥6 एवं ७००४१ 8070ए 8४0 एशा509०'४१ ]0फए, 
पएह 7९8०7 38 ए९7'ए ज़ेक्कांत ए०प 770 ए.- 
प्‌ ]096 ॥06 5प)8॥76, 806 989 278७७ #7888; 
6 एछ06 0र%7 ॥४/प्'8, [8 000०, ४०० 078026, 
90 छाए 8707 | 086 5097ए #0व एछ0पा, 


कविता: * १३४ 


प्रेश्तर इसके कि उनकी सांख मेरी काकुलों को कड़ी होने दे, 
'पेश्तर इसके कि मेरी कलियों की बाढ़ की सांझ हो, 

सब चेहरों के सारे रूप 

सब हाथा के समस्त काम 

ढूँढ़ने के श्रयोग्य स्थानों में 

समय की मारी हुई भूमियों के 

सम्पूर्ण मत्यु ओर सम्पूण जीवन, 

आर सब राज्य तथा सब वर्दोदियाँ, 
भेरे द्वारा गिरती ( टपकती ) है जेसे बालू । 

ऐ भरे लड़का, ऐ अत्यन्त कर्तव्य परायण, 

परमेश्वर के प्रति, न कि मेरे प्रति। 

क्या में यथेष्ट सुन्दर नहीं था, 

क्या स्वाधीन होना कठिन था ? 

क्योंकि, देखो, मे तुम्हारे साथ हूँ, और तुम में हैं, तथा 

तुम्दारा हूं, 
अब दृष्टि दौड़ाओ और देखो हर 
. सफलता को कुंजी । 

यहां आओ, यहां आओ, ऐ घपसन्‍न पक्षी ! 

और मुझ से यह कथा कद्दो । 

कि क्‍यों तुम खदा खुशी ओर खुखी रहते हो, 

आर कभी तुम्हे रज नह होता ? 

पत्ती मधुरता से ग्रुटका ओर धीरे से बोला, 

कारण बहुत सादा दे, तुम जानते हो । 

मैं सूये-प्ंभा को प्यार करता हैँ, खुश हरे पेड़ों को, 

सस्पूर्ण प्रक्रत का, ठंढा ठढा पवन का ( प्यार करता हु ), 
इस लिये में क्यों उदास रहें ओर सुंद्द लटकाऊं, 


श्श६ स्वामी रामतीर्थ: 


जिला पकवप्रा'.8 इ8 द्वरष्टीगंजरहु ॥/0प70 शादे #00पॉ £ 
474 ३8 78800 800 जायग्र्ट 50 हैपौए 8४/ए७ 708, 
फ्राफ 6ए७एफएट्ु ई08/6 48 ॥6088887"ए, 

पर कगोए 7 गरशफ्ीए गंएए काते ढांएए, 

व 089]॥779, ॥4077 ६0 ॥ए ए0शॉट, 

मा ए४प्रा'.8 874 ॥ 88 00०, ए०० 888, 

270 8॥6 48 #ए898 8प्री0867'ए676 $0 706, 


एफ 0098 079 ॥0प्नए, 


3 ॥6७/'त 8 007, & ७/7' 0]0ए, 

4४ 7ए 8906, &00 ठापंश्ते ।, ४“ छ9॥0० 8 77? ऊहक्र0०-? 
". जत्प्रवेशपं72, एक्च[80, 6777080, 74 ,0 ! 
त्रि०्ज़ 80 शाते इज़०७ 4,076 जरत5]08/606 0ए़, 

& पपु8 वफ०0प शा 7007९४६, 00 ए0०प मठ धा0एफ़ ९ 7? 
)0ए 8ए९९४॥6७7"४६ 4९००, हर 

(7076 76७87 8700 7697', 

शिणभास्‍798, ४४००० ४, 

शिप्ट्ठांग2, धाएे 68907, 

॥ 90980, शां॥! 5828, 

6 00707 7०70 ए. 

4...728980 8700 ट0, 

यि6 6४  ध्यते ए&्., 

“एए]ए 6 शरा6 80 १ 

278ए, 889 ; 087 20.7?! 

6 ब्रशउथ्०ा8्ते 80णए, 

# ९०, 70.7? 

3. शा0'8वा०प१-। ७7१0, 


- कपिता- १३७ 
जब कि प्रकृति इदे गंदे ओर निकट हँस रही है ! 
ओर तेयार तथा राज़ी है सच्चाई से मेरी सेवा करने के, 
इदरेक वस्तु से जिसकी कि अवश्यकता है, 
यदि केचल में मोज़ से गाता ओर चहचह्वाता हैँ, 
ओर खुशी खुशी से अपने काम में लगा हूँ, तो इस लिये । 
क्यों कि प्रक्रति ओर में एक हूँ, तुम देखते हे, 


ओर वह सदा मेरी चेरी बनी रद्दती है । 


प्रकाश के खण्ड । 
मैंने सुनी एक ठोकर, कड़ी चोट, 
अपने फादक पर, और में चीखा “ कौन है ” ! 

में आश्चर्य डुझा राद्द देखने लगा, यह देखो, 

'चह कैसा मधुर ओर घीमा प्यारा बहुत धीरे से बोला 
+तू दी तो खटखदाता है, क्या तुझे मालूस नहीं १ ” 
भेरे माशुक़् प्यारे ! 
निकट और निकट आ, 
घुसकक्‍याते, कटाक्ष करते, 
गाते, ओर नाचते । 
आहँों से में कुका अर्थात्‌ प्रणाम किया, 
उस ने कोई उत्तर नहीं दिया 
में ने प्राथेना ओर दृरडचत की 

वह चल दिया ओर चला गया 
“क्यों मुफे इस तरद्द ( पृथक्त करते ) काथ्ते दो ? 
कृपया ठहरो, न जाओ,” । 
दस ने धीरे से जवाब दिया, 
/ नहीं, नहीं “| 
: मैं ने बड़ी बिनती की, 


श्श्ष स्वामी रामतीर्थ- 


८ 9:87, शा 99 776, 74070,7 
+36 धाएएश'हपे 

फए०००१5४ 7900 & 099 706 १ 
वक्ष 60, 90888, था 05 पु॥४९.?! 


' व्‌ ; ५ [)0 छघ४० आ6९ 89628. 7 


पर6 : ५ फशाक' 7000 77/0 878008 688]0. 7? 

:; “व छत०्पोर्त 0880 7608 970 [दंड ; 

70087, 87906 778 09पा 05, ?? 

फ्र6 :-- ९ ए॥00 शाह 0४8७० 098९ 00 ए58 
व्‌ 7 096 एछो7 708, एश।ए 7255 ? - 

४ [ए +407 /ए)॥९, 

38 27 7779889 0 40॥76. 

फाओए 8९४२ ४॥6७ ६077॥, 

0, 80प7786 0 शक्ापा ३ 


' एकता 7४०० 7 ॥6, 


000,0०पर॑फ&7'तै गी५, 

2077 809॥/ 706 80, 

आए 0एफशाते ह0 १?! 

2. 476 207फएब707शा 7 + एत0ए, 

ग0 थी! | 8९6 800 (6४7५, 

भिए हि।४7९55 38 ९ 9फर0०ाय एशंप्रते, 

4 ६8808 006 ॥7680७॥ 07 0फ0७7/8. 

40 706 ह6 जणां3060०७४ )68ए९8४ 99 0, 
ते 5ज़68छां, ॥06 ॥99 0० ग079678, 


- 3 के & ए0078 7 86 शॉयं88, 


3700767 ३70 006 27888, 


कविता. श्३६ 


दया करके भरें पास बेठो, प्रभु !” 
उस ने ठत्तर दिया; 
“क्या तू मेरे पास बठेगा ? 
तब कृपा करके जा अपने पास बैठ “| 
मे+-“/ मुझ से बोलो ?। 
वहः-“ प्रवेश कर तू गभीर मोनता मे ? | 
४ में तुझे चिपटाऊ और चूसूगा; 
प्यारे, भेरी यह अज्ज मानो ” | 
“तुझे अपने आप का चिपटाना ओर चूमना होगा,” 
हम ओर तुम तो एक हैं, क्यो चूकते हो ? 
मेरा दिव्य रूप 
तेरा एक प्रति रुप है 
क्यों तू रूप ढूँढ़ता है 
ऐे मोहनी के सूल 
तेरे साथ में लेटता हैँ 
तुम वाहर की तरफ भागते हों, 
मेरा इतना तिरस्कार न करो । 
क्या तुम बाहर की तरफ जाते दो ? 
अत्यत्तम सग में ज्ञानता हू 
रूब में जो में देखता ओर सुनता हैं । 
मेरी कान्‍्ता (ग्रेया) रगीली हवा हैं, 
मैं स्वाद लता हूँ छींटो की सांस का । 
फुसफुसाती पत्तियां मुझ पर कृपालु दे, 
आर फ़ूला के ओठ मधुर हें, 
मेरा एक स्वागत आकाश मे होता हे 
दूसरा घास में । 


2३० 


स्वामी रामताथ- 


फ़ााराग,ए88 08898. 
(0४४5 70)९, 
6 876४४ 8४०४ 89) 96 ॥99 ९७४0।९, 
क#७७त7९2, 70098, 09४ 079 099- 
ह490' 905]7879860 ०एप्र/#7 5]07680, 
एए७ए 787 920५6 ।)9 ॥680., 
87798 09 875 शान 2॥0 +$9ए 970७, 
8809, 08४०9, छोक्वां 07 ह007 ? 
5059७ फ8. 
छ97९ 807९, 2] 09ए ]07९, 
(70076 १ 0760फ7%0 ? 876 ४0००६, 
बे०४ बाते 809॥07, 87ए78]/87, ]8प"्टा7९१, 
77000॥06 50705, 
४ 20ए8 400९ पर ध्यापे ॥47"0 0०7 ॥76, 
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बतार का काथ । 
अश्य 
महान पृथिवी तेरा पालना होगी, 
दिन प्रति श्नि कूलता हुआ, 
तारों से भूषित पर्दा फेला 
हर रात को तेरे सिर पर ( होगा ), 
सथा पर सूय तेरी भाह पर मुलस्पा करेगे; 


३ 4 


( ओर कद्दंग कि ) बच्चे, बच्चे, तू कान हे ? 
ञ्त्तर। 


ऋनी ? * क्रनी ? मुसकुराते रहो | 


प्रसन्‍नता और हँसी, हंसी हँसी, 


प्रयेत्त सरत्तता 

प्रेम ने जीचन का बाजा उठा लिया। 

झोर सब तारों को ज़ोर से चज्ञाया 

चित्त की तार की बजाया, जो धरथराता हुआ 
दृष्टि से परे सगति मे सीन होगया। 


राम 


$े 


स्वामी राशा 


अमरीका के प्रसिद्ध योगी रासाचारक 
को 
याग सम्बन्धी अत्युत्तम ओर उपयोगी अग्रेजी पुस्तकों 
का हिन्दी अनुवाद ( जो ठाकुर प्रसिद्ध नारायण दारा 
अनुवादित ओर प्रकाशत हैं, घोर लॉग के दफतर म अभा 
चिक्री अथ आया हैं ) | 
नाम ग्रन्थ मूल्य 


(१) श्वास विशान ( अर्थात्‌ भाणायाम ) ॥) 
(२) हठयोग अंधात्‌ शारीरिक्र ऋलयाण १॥) 
(३) योगशाख्रान्तगत धर्म  ॥) 
(४) योगत्रयी ( कमेयोग, शञानयोग और भक्ति योग ) ॥) 
(५) राजयोग अर्थात्‌ मानसिक विकास शा) 
(६) योग की कुछ विश्रूतियाँ कु 
स्वय ठाकुर प्रसिद्ध नारायण सिंद छत अन्ध _ 
(७) संसार-रहस्य अथवा अधः एतन शा) 
(८ सीघे परणिडित (एक दाशनिक उपन्यास) १॥) 
(६) 'जीवन-मरण-रहस्य, ८५ ्। 


(९०) कैपि सिद्धान्त 2 [७५] ] <] 
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522 श्री छ परिन्नकेशन लीग, लखनऊ .